काव्या दर्पण | Kavya Darpan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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५ ७ ) यह तो वात्सल्य का ही प्रभाव है। यशोदा के हृदय में पैठकर देखिये | वहाँ वात्सल्य ही उफना पड़ता है। दूसरा कुछ नहीं है। माता-पिता का वात्सल्य स्नेह का सार, चेतना की भूरिं तथा सुधारससेक-सा होता है। अत: फ्रायड की रति वात्सल्य में नहीं मानी जा सकती। | £ तीसरा आक्षेप एक प्रगतिवादी सुप्रसिद्ध साहित्य-समालोचक लिखते है साहिव्य विकासमान है भौर वह एक महान सामाजिक क्रिया है । इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि प्राचीन आचार्यौ ते भविष्य देखकर जो सिद्धान्त बताये थे। आज वे नये साहित्य पर पूरी-पूरी तरह छागू नहीं हो सकते । उन्हें लागू करने से या तो पेमाना फट जायगा या अपने ही पेर तरासने होगे | साहित्य के विकासमान होने ओर महान सामाजिक क्रिया होने में किसी का कुछ विरोध नहीं | पर सबूत की बात मान्य नहीं है। पहले साहित्य है, पीछे शास्त्र | पहले लक्ष्य-प्रन्थ हैं तो पीछे लक्षण- ग्रन्थ | इसका पक्का और अखण्डनीय प्रमाण यही है कि उदाहरण उन्ही आदर्श लक्ष्य-पन्धों से लिये जाते हैं, उनके मेद किये जाते हैः चौर उनके गुण-दोषों की विवेचना की जाती हैं। आचार्य भविष्य-द्रष्टा नहीं होते । जो उनझ सामने होता है उसीसे अपनी बुद्धि लड़ाते हैं ओर शास्त्र का रूप देते हैं | इस दृष्टि से साहित्य दर्शन वा विज्ञान नहीं है। यह बात लोकोक्ति के रूप में-मानी जाने लगी है कि 'कलाकार समा- लोचको के जन्मद(ता होते द ।' इससे प्राचीन आचार्यो को भविष्यवादी कहना बुद्धिमानी नहीं है। अभी पुराने सिद्धान्त पूरे-पूरे लागू हो सकते है । पैमाना फटने की तो कोद बात ही नहीं । पैर नहीं, बुद्धि की तराश- खराश होनी चाहिये जरूर | वे ही आगे लिखते हैं-- काव्य के नो रसों से नये साहित्य की परख नहीं हो सकती । परखने की कोशिश की जायगी तो उसका जो नतीजा होगा वह नीचे. के वाक्यो से देख लीजिये-- न्‍ ष ( $ ) यदि किसी उपन्यास -में किसी छुप्था की छुराई है तो वह वीसत्स-प्रधान माना जायगा । | 7 १ हँस” सितंबर १६४६




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