भैरवोपदेश | Bhairvopdesh

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2.07 MB
कुल पष्ठ :
167
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)छ् शी मैरवोपदेशबाद को लव इस बात का पता चला तो मद्दाराज श्री मत दरि
को इतना श्रायात पहुँचा कि वे श्पना राय्य; प्रिय ख्ी; घन श्रादि सब
छोड़कर जन्नल में चले गये |
मद्दारण्यमां.. पासियों. श्री. शुरूने,
स॒मात्स्पेन्द्ध नारूपघारी रूरने। ४जन्नल में उनकी श्री श्रप्टमैरवों में से एक श्रीमगवान् रद से;
जिन्दोंने मगवाद् मत्स्पेन्द्रवनाय के नाम से जन्म लिया था, मेंठ हुई ।मद्दा मैरवे श्री रूरू दे घारी,
जणी केन्द्र थी आवठता ने उगारी।. ६चित्सत्व में से प्रकृति श्रपनी श्रावश्यक्तानुतार विसी एक महान,
व्यक्ति का उत्थान करती है । उसके केन्द्रस्य व्यक्ति कदते हैं।
भी मद्दाराज मत हरि ऐसे ही रेन्द्रस्थ व्यक्ति थे | उनके शीघ्र उत्यान
के लिये ही मगवान् थी रु ने जन्म लिया था। उन्दोंने उनकी
उबार लिया |
जई ने पढ्यों चरण मां राजियो ते,
थयों त्यागि ने भीख नो भाजियों ते। ७
उनको देखते दो मद्दाराज मत 'इरि उनके चरया पर गिर पड़े शरीर
सब ह्याग कर गुरू से मीग्व माँगते हुए कइने लगे
प्रमू विश्व आ दुगखलु रूप देसूं,
कहो शान्ति ने दुःख मां कयां परेसूं |
गे बम ! यद सिधि सदाद दुख से मरा गुदा दे । इसमें शान्तिकेले प्राप्त दो रुकती दे हमय
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