श्री योगदर्शन | Shri Yogadarshan

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Shri Yogadarshan by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हैमिया! रे भूमिका 1 रहे में बियार्की सहायतोसे मुमुज्को मामशः अध्यात्मपथमें भ्रग्रसर किया जाता है, योगदर्शनमें उसका अवख्म्बन तो किया ही गया है: अधिकन्तु पुसुपार्थप्रधान साधनौका भी प्रयोग साथ साथ होनेसे और साधननियाओसे उत्पन्न पत्यक्त फलौकी भी घात्ति ैसमें होनेसे योगदर्शनपथमें विचरणशील मुमुलुजनोके इृदयमें थद्धा तथा चिश्वासफी इढ़ता सदा दी वनी रदती है और इसकी, शानभूमि के प्रति परम प्रीतिका सश्तार साधकर्से दृदयमें सदा ही' होता रद्दता है जिससे /मप्यात्मशानोभति और स्वस्पस्थिति उसके छिंये बहुत ही सहज होजाती है । योगदुर्शनम लिस श्रौर अन्तःफरण शन्दकों पर्यायघाचक करके चर्णन किया गया है। स्थति में भी लिया टै-- मनों मद्दानू मतिर्ध्रंह्मा अन्नःफरणमेव च श्रश्ञा संविध्ितिमेघा पूर्वुद्धिस्ट्तिचश्ुला+ । पर्थायवाचकाः शब्दा मनसः परिकीतिताः ॥ सन, महान, मति, श्रह्मा, अन्तःफरण, मंशा, संधित्‌, चित्त, मेधा आदि शन्द पर्यायवादक हैं । इसी चित्त अर्थात्‌ अन्त.करणसो यमनियमादि साधारण उपाय «अथवा ईश्वर्प्रणिधान, अभिमत ध्यानादि असाधारण उपाय, फ्िसीकी भी सद्दायतासे निर्द्ध: कर देने पर पुदप प्र्धतिके 'वन्धनसे मुक्त होकर खस्वस्पको प्राप्त हो जाता है, यही इस दर्शनका सार सिद्धान्त है । न्याय शरीर चैशेपिक दर्शनीसी भ्ूमियोकों अतिनामण करके साधक थोगदर्शनसी भ्रूमिकों पाप्त फरता है। योगदर्शन और सांख्य- दुर्शनकी भूमि प्रायः पक ही प्रफास्की हैं। केवल इतना ही मेद है कि सांप्यकारने स्प्टदपसे पश्चीस तस्वीफों माना है और योगदर्शन- मे छुन्यीस तत्त्वीको माना है। योगदर्गनमताजुसार वह छन्मीस्ां तच्ष्व ईश्वर है.। इससे यदद, नहीं समभना चाहिये कि. सांख्यदर्शनफारने ईश्वरको माना ही नहीं: यूके उन्होंने 'दंश्यराखिद्धे'इस सूभके हाय ईश्वस्के अस्सित्वका स्वीकार ही झिया है । केवल इतनी दी बात हू कि सांयपदर्शनमें लौकिक पुरुपार्यफे ढारा इस्वर असिद्ध है परन्तु यौगिक जौ किक पुरुपार्थ ास ईश्वर सिद्ध है ऐसाही कहा ग सांरयदर्शनभूमिर्मे ्यलौकिफ पुस्पार्थका प्रयोजन नहीं है इसलि




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