श्री रामस्वयम्बर | shri ramswayamber

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shri ramswayamber  by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(द्) रामस्वयंवर । वरनहूँ रीति वाठमीकी जेहि सुनि पुनोत त्रह्मांडा ॥ उक्ति युक्ति तुरसीकृत केरी और कहां में पाऊं । वाठमीकि अरु व्यास गोसाई सूरहि को शिर नाऊं ॥ युगुल भादि कवि युगकढि कविरवि इष्टदेव मम चारों । उपजे अधम उधारण कारण सकठ विश्व उपकारी ॥, काव्य प्रबंध छंद बन्धन को मैं कछ जानईुँ नाहों ।_- रचहूँ यथामति रामकथा को भजन मानि मन माही ॥ सोरठा-जय जय दृशरथलाठ, अवधपाठ कढिकाठहर । अनुपम दीनदयाठ, दे मति करहु निहाठ मोहि ॥ घनाकषरी । पाठतप्रनासमाजकरतसधमे राज जाकों दृण्डपरमप्रचंडयंमराजसो ी ठाजकोजहाजकरेशवन पराजेपरहितसवकानझीठनाकोंद्िजराजसों भनरघुराजभयाश्रमिमंद्राजराजनियुणीनिवाजनिभोदूजोदिवराजसी! अवधविरानभाजुवंशाशिरताजचक्रवर्ती औरकौनदश्रत्थमहाराजसी परम सुजान आठसचिवसुनीतिवानतिनमें सुमन्तरेंप्रधानराजकाजके। वामदेव त्यें वशिष्ठगुरूउपरोदितरें रक्षनकरयासदाधमेकेजहाज के । पूरणप्रकृतिसातधीरवीरदेंविरुयातरयोमहारयीअतिरथीरणसाज के । भनेरघुराजजाकासुयशद्राजनाकेवन्धुमित्रमेघीमववान केमिजाजके छंदू चोबाला || सरयू तीर सोदावन कोशाठ नगर वसत अति पावन । निन छवि अमरावती उनावन सुरन मोद उपनावन ॥ दादश याजन उम्न मान तेहि याजन थे विस्तारा । कनक काट अति माट छाट नाद विमठ विशञाठ बजारा ॥ गठी चारु चाडी जमठा सब में देर सुंदर तुद्ग। नमित कता के उसव पता मान रच्यो जनडा ॥ दृरम मनादर रानगटा छदु फूडन ते छा छाई की




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