तुलसी साहित्य में सौंदर्याभिव्यक्ति | Tulsi Sahitya Mein Saundaryabhivyakti

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Tulsi Sahitya Mein Saundaryabhivyakti by दुर्गाप्रसाद श्रीवास्तव - Durga Prasad Srivastava

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रास्किन - “वाद्य जगत में कुछ ऐसे उपादान हैं जिनके द्वारा ईश्वर के नानाविध गुण हमारे मन में अभिव्यक्त होकर चित्त में सौन्दर्य का संस्कार उत्पन्न करते हैं। .इन समस्त उपादानों के माध्यम से ईश्वर ने अपने स्वरूप को जगत में लक्षित करा दिया।** रस्किन सौन्दर्य का आवश्यक तत्व नैतिकता को मानते हैं ।** उनके अनुसार सौन्दर्य को आनंद से युक्त तो होना चाहिए, उपयोगिता तत्व उसके लिये जरूरी नहीं ।” सौन्दर्य को पूर्णता में स्वीकार करता है उसके अनुसार ““पूर्णता के आविर्भाव में ही सौन्दर्य अवस्थित है।** - सौन्दर्य के दर्शन नैतिकता में करता है।** पीअर बफिअर, जे रेनाल्ड्स एवं एलसिन - इनके द्वारा प्रतिपादित आदत के सिद्धान्तानुसार जिस वस्तु को हम जिस रूप में देखते रहे हैं वही रूप उसका सौन्दर्य माना जाने लगता है।””* बामगार्टेन धन हॉबिस एच०एच० परखूरष्ट - “कला का मुख्य ध्येय अपने शब्दों के माध्यम से विश्वजनीन संघर्ष को नित करना है। वह प्रत्येक वस्तु सुन्दर है जो किसी सफल माध्यम री प्रयोग से उत है, जो उसे व्यक्त करता है।** स्नेह किया जा सके!” * लि ही




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