साहित्यिक जीवन के अनुभव और संस्मरण | Sahitiyk Jeevan Ka Anubhav Aur Sansmaran

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
949.72 MB
कुल पष्ठ :
152
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)[३1
'पर वें पुस्तकें भेज दी जाएँ गी, जिन का अनुवाद कराना है।
यह काम “जैन ग्रन्थ रत्ताकर' की शोर से हो गा ।” दाब्द
मुझे याद नहीं, आशय. यही था ।
मुझे यह जान कर बड़ी प्रसन्नता हुई कि मेरी हिन्दी को
साहित्य के एक. बहुत पुराने श्ौर प्रतिष्ठित लेखक-प्रकादाक
ने पसन्द किया हैं। अधिक सुख इस लिए भी मिला कि यह
प्रशंसा मुझे अनायास मिल गई थी--उस पुस्तक: में भाषा
के बनाव-श्ुंगार पर में ने कतई ध्यान न दिया था । बोल-
चाल की साधारण भाषा में हृदय की बात कह गया था ।
प्रेमी जी के फत्र से में ने समझा कि साधारण बोलचाल की भाषा
भी पसन्द की जाती है श्रौर इस हृद तक पसन्द की जाती है ।
भाषा के सजाने-सँवारने में जो सिर खपांया जात। है, उस के
ददें से में अपरिचित न था। वह सब झंझट भी न करने
पड़े और “बढ़िया भाषा” का प्रमाणपत्र भी मिल जाए, इस से
अच्छा झौर क्या ! “बिनु प्रयास लंका गढ़ जीता ।' एक
बड़ी समस्या हल हो गई। भाषा का स्वरूप अपने लिए
निश्चित कर लिया ।. वहीं आज तक पकड़े बैठा हूँ--चल
रहा हूँ ।
सनातनी प्रवृत्ति
में ने लिख दिया प्रेमी जी को कि वे तीनो पुस्तकें भेज
दीजिए, जिन का अनुवाद आप कराना चाहते हें। मुझे
और चाहिए क्या था? साहित्यिक -जीवन के प्रारम्भ में
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