प्राचीन भारतीय गणित | Prachin Bharatiya Ganit

Prachin Bharatiya Ganit by डॉ ब. ल. उपाध्याय - Dr. B. L. Upadhyay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१४ ऐतिहासिक एवं सांस्कतिक अध्ययन करू । यदि देव के अन्य विद्वान इसी प्रकार अपने २ शास्त्रों की शब्दावली का अध्ययन कर दें तो अचिरकाल में राष्ट्रभाषा का यह शुन्य प्रकोष्ठ भर सकता है । विषयवस्तु मैंने गणितदयास्त्र की उस हिंदी दाब्दावली को ही अपने अध्ययन का. विषय बनाया है जो पिछले ५०-६० वर्षों से अपने देश में प्रचलित रही है और जो संस्कृत भाषा की देन है । स्वर्गीय बाएु देवशास्तरी महामहोपाध्याय पं० सुधाकर ह्िवेदी तथा काक्षी नागरी प्रचारणी सभा के उन विद्वानों के हम चिरक्णी हैं जिन्होंने उस दासता-काल में भी हिंदी भाषा के रूप को संजोये रकखा । उन्होंने अंगरेजी शब्दावली के पर्यायों के रूप में अपने प्राचीच गणितीय शब्दों को सुस्थिर किया जो १९११ ई० के लगभग काशी नागरी प्रचारिणी सभा की वंज्ञानिक शब्दावली नामक पुस्तक में प्रकाशित हुई थी तथा इसका द्वितीय परिमा जित संस्करण १९३१ ई० में प्रकाशित हुम्ना । मैंने इसी पुस्तक के प्राचीन एवं आधारभूत गणितीय दाव्दों को माध्यम बनाकर गणितीय शब्दावली का विवेचन किया है जो गणितीय शब्दावली की व्युत्पत्तियों मूलखोतों विभिन्‍न कालों में उनके प्रयोगों एवं उससे विनिगंत कुछ ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक तत्वों पर प्रकाश डालता है। इस प्रकार का यह प्रथम प्रयत्न है यद्यपि आनुष॑गिक रूप से डॉ० दत्त एवं डॉ० ए० एन० सिंह ने गणित शास्त्र के इतिहास तथा श्रपने अन्य गणितीय लेखों की कतिपय पंक्तियों में साघा- विषयक रुचि का परिचय दिया है जो अत्यन्त सराहनीय है किन्तु न वे भाषा-शास्त्र फे पंडित थे और न उनकी गवेषणा का यह विषय था । ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने इन पंक्तियों को लिखकर केवल एक आह्वान किया था कि कोई प्राचीन हिंदू गरिएत के केवल दाव्द-पक्ष का अध्ययन करे । शब्दावली फे श्रध्ययन से लाभ . इस प्रकार के अध्ययन से मुख्यतः दो बड़े लाभ होते हैं एक तो किसी विषय के पारिभाषिक शब्दों की व्युत्पत्ति तथा अर्थ ज्ञान के बिना विषय की आत्मा सक नहीं पहुँचा जा सकता है और बिना इसके देश में उच्चकोटि के विद्वान निकलने असंभव हैं । उदाहरणतः हिन्दी का इमली शब्द व्युत्पति ज्ञाव के बिना एक याहन्छिक शब्द लगता है कितु जब हमें यह मालूम हो कि यह संस्कृत दाब्द अमूली से बना है तो इसके अम्ल होने के गुण-ध्म का भी पता चल जाता है । प्राचीन हिस्दू गणित की प्रसिद्ध पुस्तक गणित सार-संग्रह में लघुतम समापवत्ये के लिए निरुद्ध शब्द प्रयुक्त किया गया है जिसका अं बिना बताए संस्कृत के बड़े से बड़े साहित्याचार्य भी नहीं समझ सकते । दूसरा बड़ा लाभ यह है कि शब्द-विवेचन से चिषप तो बोघगम्य हो हो जाता है किन्तु भापा की भी उन्नति हो जाती है । जिस माषा के धाब्दों की न तो व्पुत्पत्ति का पता हो और न इस वात का पता हो कि




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