गढ़ कुंडार | Garh Kundar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(१४ 9थी । उनके पतन की जिम्मेदारी उनके निज के दोषों पर कम है । चसका दायित्व उस समय के समाज पर अधिक है । लेखक को इसी कारण 'ाग्निदत्त पाडे की शरण लेनी पढ़ी ।जिस तरह गढ-कुडार पर्वतों 'और वनों से परिवेष्रित बाइर की च्ष्टि से छिपा हुआ पडा है, उसी तरह उसका तत्कालीन इतिहास भी दवा हु्मा-सा है ।परतु वे स्थल, बद्द समय 'और समाज 'झब भी 'अनेको के लिये 'झाकपंण रखते हैं ।उपन्यास में वर्णित चरित्रो के वर्तमान सादश्य प्रकट करने का इस समय लेखक को अधिकार नहददीं, केवल छापने एक मित्र का नाम छृतज्ञता-ज्ञापन को विवशता के कारण बतलाना पडेगा । | नाम है दुजंन कुम्दार । सुल्तानपुरा ( चिरगाँव से छत्तर में २ मील )का निवासी है । कहानी में जिन स्थानों का वर्णन किया गया | है, वे जगलों में 'ास्त-व्यस्त अवस्था में पढे हुए हैं । दुजन कुम्दार की सद्दायता से लेखक ने उनको देखा । “गढ-कुढार” का छाजुन _ फ्दार इसी दुजन का प्रति्बिब है । “गढ-कुडार” की कहानी . चसने सुनी है, उसने समसी भी है या नहीं, यह तो नहीं कददा जासकता, परंतु उसको यदद कहते हुए सुना है, “बाबू साथ, सोरे 'चाएकोड दूँफा-ूँका भले कर हारे, पै नौन-दरामी मोरं कर हुए 7खककी




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