श्री ब्रह्मानंद मोक्ष गीता | Shri Brahmanand Moksha Geeta

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Shri Brahmanand Moksha Geeta by परमहंस ब्रह्मानंद स्वामिना - Paramahans Brahmanand Swamina

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about परमहंस ब्रह्मानंद स्वामिना - Paramahans Brahmanand Swamina

Add Infomation AboutParamahans Brahmanand Swamina

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
(रद) किंच जीविकाके छोभसें दूसरे धर्मको कदी नहिं थ्रहण करना चहिये तथा द्व्यलाभके लोभसें दुष्ट चीच पुरुपॉंका संग वा सहवाससी नहि करना चहिये इति ॥ ३४ ॥ सतोष॑ परसास्थाय खधमेनिरतः खुधीः । कछुडवपोषणं छुयात्‌ यथाकालं यथाक्रमम ३५ किंतु परमसंतोपमें स्थिर रहकरके बुद्धिमान पुरुषको देश काल समयके अनुसार छुइंवका पोषण करना चहिये इति ॥ इ५ ॥ . पितुः झुूषणं नित्य मातृशुश्रूषर्ण घुन४ । कयोदनन्य भावेन युरो। झु्भूषण तथा ३६ और सवे कुडुंबका पोषण करतेहये अपने पिता माता तथा युरुकी विद्लोेष करके अनन्य- चित्तसे भावभक्तिपूवक सेवा शुश्रूपा करनी 'चहिये इति ॥ ३६ ॥ शुूषण हि दृद्धानां पर कल्याणकारणमस । ग्हीयादादिषस्तेषां नित्यमात्महिते रत। ३७ क्योंकि दुद्ध पुरुषोंकी सेवा शुश्रूषा .करनेसें




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now