एकाग्रता और दिव्यशक्ति | Ekagrata Or Divyashakti

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Ekagrata Or Divyashakti by श्री सन्तराम - Shri Santram

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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| ७. कि, के. हु के बा». के च्छा, चिचारके चलनेका रोते आर लहर । ९. विचार नीरस प्रतीत होंगे तथापि नये पाठकोके, लाभाथ॑ मुझे इनका दुबारा कहना आवश्यक है । आकाश ( ईथर ) एक अद्द्य माध्यम है । इससे सारा अन्तरिक्ष भरा हुआ है । अन्तरिक्षमेसे प्रकाशके आवागमनके लिए वैज्ञानिकोंने इसे एक आवइयक वस्तु माना है; क्योकि वहीं वायु आदि कोई दूसरा साघारण माध्यम पाया नहीं जाता । वैज्ञानिक छोग इसे एक साफ और गाढ़े+रसके जैसा पदार्थ बताते है। रोजीक्रुइ्यन ढोग इसे एक सजीव अभ्मि-शिखा समझते है | तत्त्ववेताओंका एक शुप्त सम्प्रदाय है। वे ठोग अपने आपको प्रकृतिके रहस्योंका ज्ञाता और असाधारण दाक्तिवाला बताते हैं । जिसे तेजोमय इंथर ( 6067 ) कहा जाता है, इस समय हमारा सम्बंध उसीके वैज्ञानिक मूल या निर्दिष्ट स्थानसे है | मेरे पाठक यह बात आसानीसे समझ जाएँगे कि शून्य-देश ( उअन्तरिक्ष ) को भरनेके छिए किसी वस्तुका होना परमावश्यक हैं; नहीं तो सूर्य्य, चन्द्र और दूरस्थ तारागणोसे हम तक प्रकाश कभी न पहुँच सकेगा । प्रकाश इंधर ( आकाश ) मेंसे * लहरों * द्वारा चलता है । - छोटे छोटे परमाणु या कण शून्य-देदामेसे समकेन्द्रिक ( अर्थात्‌ एक ही केन्द्रवाली ) तरह मालामें चलते हैं । प्रत्येक कण अपने पासके कणको गति देता है और वह फिर आगे अपने साथके कणको । यह भी याद रहे कि प्रत्येक कण या परमाणु अपनी बारीमें क्षोभका एक केन्द्र बन कर लहरें पैदा करने छगता है। इन लहरोंकी लम्बाई अत्यन्त छोटी होती है और वे अमित वेगसे चलती है । जैसे जठमे पत्थर फेकनेसे तख-माछा उत्पन होती है बैसी ही




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