योगिराज श्रीकृष्ण | Yogiraj Shri Krishana hindi
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5.97 MB
कुल पष्ठ :
150
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)14 / योगिराज श्रीकृष्ण न होने से विभिन माण्डलिक राजा नितान्त स्वेच्छाचारी तथा प्रजापीड़क हो गये थे । मथुरा का कस मगध का जरासंध चेदिदेश का शिशुपाल तथा हस्तिनापुर के दुर्योधन प्रमुख कौरव सभी दुष्ट विलासी ऐश्वर्य-मदिरा में प्रभत्त तथा दुशचारी थे । कृष्ण ने अपनी नीतिमत्ता कूटनीतिक चातुर्य तथा आपूर्व सूझबूझ से इन सभी अनाचारियों का मूलोच्छेद किया तंधा धर्मराज कहलाने वाले अजातशु को आर्यावर्त के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर आरयों के अखण्ड सक्वर्ती सार्वभौम साम्राज्य को साकार किया । जिस प्रकार वे नवीन साम्राज्य-निर्माता तथा स्वराज्यस्रष्टा युगपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हुए उसी प्रकार अध्यात्म तथा तस्व-चिन्तन के क्षेत्र में भी उनकी प्रवृत्तियाँ चरमोत्कर्ष पर पहुँच चुकी थी । को समान समझने वाले लाभ और हानि जय और पराजय जैसे इन्द्रों को एक-सा मानने वाले अनुद्विग्ग वीतसग तथा जल में रहने वाले कमल पत्र के समान सर्वथा निर्लेप स्थितप्रन्न व्यक्ति को यदि हम साकार रूप में देखना चाहें तो वह कृष्ण से भिन्न अन्य कौन-सा होगा ? प्रवृत्ति और पिवृत्ति श्रेय और प्रेय ज्ञाम और कर्म ऐहिक और आमुष्मिक परलोक विषयक जैसी आपातत विरोधी दीखने वाली प्रवृत्तियों में अपूर्व सामंजस्य स्थापित कर उन्हे स्वजीवन में चश्तार्थ करना कृष्ण जैसे महामानव के लिए ही सम्भव था | उन्होंने धर्म के दोनो लक्ष्यों-अभ्युदय और निेयस की उपलब्धि की । अतः यह निरपवाद रूप से कहा जा सकता है कि कृष्ण का जीवन आर्य आदर्शों की चरम परिणति है । समकालीन सामाजिक दुरवस्था विषमता तथा नष्टप्राय मूल्यों के प्रति भी वे पूर्ण जागरूक थे । उन्होंने पतनोन्मुख समाज को ऊर्ध्वगामी बनाया । खियों शूद्ों बनवासी जनों तथा पीड़ित एवं शोषित वर्ग के प्रति उनके हृदय में अशेष संवेदना तथा सहानुभूति थी । गांधारी कुम्ती द्रौपदी सुभद्रा आदि आर्य-कुल ललनाओ को समुचित सम्मान देकर उन्होंने नारी वर्ग की प्रतिष्ठा बढ़ाई । निश्चय ही महाभारत युग में सामाजिक पतन के लक्षण दिखाई पड़ने लगे थे । गुण कर्म तथा स्वभाव पर आश्रित मानी जाने वाली आर्यों की वर्णश्रिम व्यवस्था जन्मना जाति पर आधार हो चुकी थी । ब्राह्मण वर्ग अपनी स्वभावंगत शुचिता लोकोपकार भावना त्याग सहिष्णुता सम्मान के प्रति निर्लेपता जैसे सद्गुणों को भुलाकर अनेक प्रकार के दूषित भावों को ग्रहण कर चुका था । आचार्य द्रोण जैसे शस्त्र और शास्त्र दोनों में निष्णात ज्राह्मण स्वाभिमान को फिलांजलि दे बैठे थे तथा सब प्रकार के अपमान को सहन करके भी कुरुवंशी राजकुमारों को शिक्षा देकर उदरपूर्ति कर रहे थे । कहाँ तो गुरुकूलों का वह युग जिसमें महामहिम समाटो के राजकुमार भी शिक्षा ग्रहण करने के लिए आचार्य कुल में जाकर दीर्घकाल तक निवास करते थे और कहाँ महाभारत का यह युग जिसमें कुरुवृद्ध भीष्म के आग्रह उसे आदेश ही कहना चाहिए से द्रोणाचार्य ने राजमहल को ही गुरुकुल अथवा विश्वषिद्यालय? का रूप दिया और उसमें शिष्य-शिष्य में भेद उत्पनन करने वाली जो शिक्षा दी उसका निकृष्ट फल दुर्येधिन के रूप में प्रकट हुआ । सामाजिक समता के क्लास के इस युग में क्षत्रिय कुमारों में अपने अभिजात कुलोत्पनन होने का मिथ्या गर्व पनण तो उधर तथाकथित हीन कुल में जम्मे कर्ण विस्तृत कर्ण तो कुन्ती का कमीन फ था किततु उसका पालन अधिरथ नामक एक साथी सूत ने किया
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