अशोक | Ashoka

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Ashoka by चन्द्रगुप्त विध्यालंकर - Chandragupt Vidhyalankar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१६ व््रशषोक | तीसरा +ाा जा नहीं दो सकता कि उस पर किसी राजकुमार का दी शासन रहे । नेता-राजकुमार तक्षदिला श्रापको चाइती दे । सब लोग-- च्िक्ञा कर राजकुमार अदो क चिरंजीवी हो । अद्योक--श्रच्छा भाइयों यद्ी सही । सम्राट से देदा लेकर में तलशिला को दी अपना केन्द्र बनाऊँगा । जनता में दषध्वनि दोती दे तीसरा दृश्य म्थान---पाटठीपत्र के एक सुरम्य मकान का गन । समग्र--चंदनी रात । कुमारी शीला इसराज बजा रही हे । कुछ देर ्रक इस वाद्य-यन्त्र को चुपनाप बजाते रददन के बाद वह सदसा गाने लगती दे । गोत द्वार-निकट देख सजनि कौन गीत गाये कौन देश बसे पूछ श्राज किघर जाये शिथिख-करठ कौन बात कहे क्या सुनाये कोई सुप्त करुण भाव हृदय में छिपाये । आज इन्दु कर उठाये अवनी शोर श्ाये बीच खड़ी श्याम रजनी पलक पथ बिछाये । दुग्थ-घवछ विश्व सकढ व्योम खिल-खिछाये एक यही बन्घु दीन बिक क्यों दिखाये किघर अध्य-कुसुम सखी पथिक फिर न जाये




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