संत विनोबा की आनंद यात्रा | Sant Vinoba Ki Anand Yatra

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Sant Vinoba Ki Anand Yatra by सुरेश रामभाई - Suresh Rambhai

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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'बिहार में प्रवेश रद 'भी दम उसे हिंसा नहीं कहना चाहते हैं! हिंसा से उसे श्रलग पर्ग में रखना चाहते हैं । हम उसे हिंसाशक्ति से भिन्न दरडशक्ति कहना चाहते हैं, क्योंकि वह शक्ति उनके हाथ में सारे समुदाय ने दी है । इसलिए, वह दिंसाशक्ति नहीं, निरी हिंसाशक्ति नहीं, पर दरडशक्ति है । उस दंडशक्ति का भी उपयोग करने का मौका न श्राये, ऐसी परिस्थिति देश में निर्माण करना हमारा काम होगा |”? इसका स्पष्टीकरण करते हुए बाबा ने कहा : ““ट्राडशक्ति के श्ाघार पर सेवा के कार्य हो सकते हैं । सेवा तो वह जरूर होगी, पर वह सेवा नहीं होगी; जिससे कि दण्डशक्ति का उपयोग ही न करना पड़े, ऐसी परिस्थिति निर्माण हो । एक मिसाल--लड़ाई चल रही है। सिपाही जर्मी हो रहे हैं । उन सिंपाहियों की सेवा में जो लग गये हैं, वे भूतदया से परिपूर्ण होते हैं । वे शब्चु-मित्र तक नहीं देखते हैं और अपनी जान खतरे में डालकर युददक्ेत्र में पहुँचते हैं । श्रौर ऐसी सेवा करते हैं, जो केवल माता ही श्रपने बच्चों की कर सकती है । इसलिए, वे दयालु होते हैं, इसमें कोई शक नहीं । वद्द सेवा कीमती है, यह हर कोई जानता है । लेकिन युद्ध के रोकने का काम वे नहीं कर सकते । उनकी दया युद्ध को मान्य करनेवाले समाज का एक हिस्सा है । “जैसे एक यंत्र में श्रनेक छोटे-बड़े चक्र होते हैं, वे एक-दूसरे से भिन्न दिशा में भी काम करते होंगे, फिर भी वे उस यंत्र के अंग दही हैं । तो एक ही युद्ध-्यंत्र का एक अंग है--सिंपाहियों को कत्ल किया जाय श्र उसी युद्ध-यंत्र का दूसरा झंग है--जरूमी सिपाहियों की सेवा की जाय | उनकी परस्पर विरोधी गतियाँ स्पष्ट हैं । एक क्रूर कार्य है; एक दया-कार्य है, यह हर कोई जानता है । पर उस दयालु हृदय की वह दया श्रौर उस क्र ढृद्य की वह करता; दोनों मिलकर युद्ध बनता है । ये दोनों युद्ध चनाये रखने .ग्वाले दो हिस्से हैं । कठोर वैज्ञानिक भाषा में बोलना हो, तो युद्ध को जन . तक हमने कबूल किया है; तब तक चाहे हमने उसमें जख्मी .सिपाही की सेंवा




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