गणितानुयोग | Ganitanuyoga

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
26 MB
कुल पष्ठ :
578
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)[७]
लोक-बिज्ञान और आत्म-साघनालोक-विज्ञान दो प्रकार का है :--लोक स्वरूप विज्ञान और लोक स्वमाव विज्ञान ।
लोक का आकार आयाम-विष्कम्म, मध्य भाग, समभाग, विशालता-विभाग, लोकस्थिति आदि का विदिष्-ज्ञान, लोक स्वरूप विज्ञान है ।
प्राचीन और मअर्वाचीन भूगोल-खगोल साहित्य के स्वाध्याय से लोक स्वरूप पा विज्ञान होता है ।प्राणियों की उत्पत्ति, स्थिति, विनाश, जन्म-मरण, सुख-दुख, पुण्य-पाप, स्वाधंपरता, छल-छिंद्र, छणा,
जुगुप्सा, राग देष, ईर्ष्या भादि का ज्ञान लोक स्वभाव विज्ञान है ।आगमो के स्वाध्याय से लोक स्वभाव का विज्ञान होता है । यद्यपि लोक स्वरूप विज्ञान और लोक स्वभाव
विज्ञान थे दोनों भिन्न-भिन्न हैं, तथापि इन दोतो का परस्पर आधार-आधषेय भाव का सबब है । क्योकि लोक
स्वरूप का विज्ञान होने पर ही लोक स्त्रभाव का विज्ञान हो सकता है । इसी कार्य कारण-माव का द्योतक घ्में-
ध्यान का एक प्रकार सस्थान-विचय है ।आचायें उमा स्वाति ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि लोक के (सस्थान) स्वरूप का विचार करने
में मनोयोग लगाना सस्थान विचय घर्मध्यान है ।इसी प्रकार लोकानुप्रेक्षा * का भी यही भाव है । दशवैकालिक-सूत्र के अ० ४ मे मोक्ष-साघना का क्रम-
बताते हुए कहा गया है कि जब आत्मा को परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है तो वह (सज्ञ) लोकालोक को जान लेता है ।जेन-दर्शन का एक प्रमुख सिद्धान्त कमेंवाद है । भर कमंबघ से विरत होकर कर्म मुक्त होना ही आत्म-
साघना है। बन्घ ससार है और बन्धमुक्ति मोक्ष है--ये दोनो इसी लोक मे है। शुमाशुम कर्मों का बन्घ, फलमोग
और मुक्ति का चिन्तन-मनन ही. लोक-स्वभाव का चिन्तन-मनन है, किन्तु शुभाशुम कर्मों का वघ, फलभमोग भौर
उनकी मुक्ति इस लोक मे होते है ।[क] शुमाशुम कर्मों का बन्घ तीनो लोक मे होता है, किन्तु फलमोग भिन्न लोक मे होता है ।
[ख] मशुम कर्मों का फलमोग प्राय अघोलोक मे होता है ।[गे लू कर्मों का फलमोग प्राय मध्यलोक और ऊध्वलोक मे होता है |[घ] भात्मायें करे मुक्त होती हैं मध्यलोक मे और स्थित होती हैं लोक के अग्रमाग पर ।इन उक्त फलितार्थों की दृष्टि मे छोक स्वभाव के चिन्तन-मनन की जितनी उपादेयता आत्म साधना मे है
उतनी ही या उससे कही अधिक लोक स्वरूप के चिन्तन-मनन की है । क्योकि लोक स्वरूप-विज्ञान की पृष्ठ भूमि
पर ही लोक स्वमाव-विज्ञान-मवन का निर्माण समव है । मत लोक स्वरूप-विज्ञान आत्म-साघना का एक अभिन्न
गग है । यदि आत्म साधक तीन लोक के स्वरूप का ज्ञाता होगा तो वह लौक स्वभाव का चिन्तन-मनन भी सहज
माव से कर सकेगा ।१... त्रिभुवन सस्यान स्वरूप विचयाय स्मृति
समन्वाहारों संस्थान विचयों निगद्यते ।
तत्त्वाथें वृत्ति अ० €, सू० ३६, पृष ३-६ ।२... अघस्तादुपरि तिरयंक च सर्वश्रा काशो$्नस्तोवतंने
तस्पानन्ता काशत्यों लोकाकाशा पर सश्ञत्यातिशयेन
मध्य प्रदेश लोको वतंते तस्य लोकस्य स्वभाव कि द
सस्याना घनु चिन्तन कु्वतो भव्य जीवस्य
तत्त्वज्ञानस्थ विशुद्धिभंवतीति लोकानुप्रेक्षा ।
तत्त्वाधवृति अ० €, सु० ७, पु० र८प८ |
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