घृणामयी | Ghirinamayi

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutElachandra Joshi
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
187
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about इलाचन्द्र जोशी - Elachandra Joshi
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)चुणामयी । १०वह कुर्सीमें बैठकर कंहानी पढ़नेमें व्यस्त रहता तो उसे उठाकर और
बातोंमें भुलाकर कुर्सीकों चुपकेसे पीछे खिसका देती और तब उसे
बैठनेके लिये कहती । वह ज्योंही बैठने जाता सोंही धड़ामसे ज़मीनपर
गिर पड़ता | मैं खिलखिलाकर हँस पड़ती । वह नकियाता हुआ, बड़-
बड़ाता हुआ उठ बैठता और फिर मुस्कुराकर फ्रेंच भाषामें गाली देते डुए
कहता-- ' औफों तेरिन्ठ 1” ( छ्त3ि0£ (पोज )* हम लोग
अब फ्रांसीसी भाषा सीखने ठगे थे । कभी ऐसा होता कि मैं राजूको
बूँसोंसे मारती और राजू भी उन व्रूँसोंका जवाब पूँसोंमें देता । इस पूँसे
बाज़ीको देखकर छीला रोती हुई अम्मौके पास जाती और हमारी शिका-
यत करके उन्हें बुला छाती । एक दिन इसी तरह हम दोनोंकी पूँसे-
बाजी चल रही थी । छीछाकी जासूसीके फलस्वरूप अम्मों दबे पाँव आ
खड़ी हुई । अम्मैको देखकर हम छोग बाघकी तरह डरते थे । हम दोनों
सन रह गए । उअम्मों कुछ मिनटों तक अँखें छाल किए हुए चुपचाप
खड़ी रहीं । फिर बोरली--*' शाबाश उजा, दाबाश ! वाह रज्जू, तू भी
बहुत होशियार हो गया है ! यही तुम छोगोंकी पड़ाई हो रही है । कहाँ
गई मादमाज़ेठ पावलोवना १ वह रौंड क्या यों ही दो सौ रुपए ढेती है
इधर इन छोकरे-छोकरियोंकी यह हालत है ! कोई देखनेवाला नहीं,
कोई सुननेत्राला नहीं । इनके काकाने इन्हें सिरपर चढ़ा ठिया है । जब
लकड़ीकी मारसे इन लोगोंकी हृड्डियाँ दुलत की जातीं, तब कहीं ये ठिकाने
आते ! उस गोरी रैंडिकी पाँचों घीमें तर हैं । कुछ मिहनत नहीं, कोई
काम नहीं । घूमती-फिरती है, मोटरमें सैर करती है, नाच-पार्टियोंमें
जाती है और हरामके दो सौ रुपए हर महीने बैंकमें जमा करती है ।”+ बेजा बातें बकनेवाली बालिका ।

User Reviews
No Reviews | Add Yours...