कुन्द्कुंदाचार्य के तीन रत्न | Kund Kundachrya Ke Tin Ratn

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गोपालदास जीवाभाई पटेल - Gopal Das Jeevabhai Patel

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पं. शोभाचंद्र जी भारिल्ल - Pt. Shobha Chandra JI Bharilla

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रह कुन्दकुन्दाचायेंके तीन रत्न करते है कि दन्तकथा ( प्रसिद्ध-कथा-न्याय ) के अनुसार कुन्दकुन्दाचार्य स्वय पूर्व विदेहमें गये थे और श्रीसीमन्घर स्वामीके पाससे विद्या सीखकर आये थे । श्रवणबेठगोलके शिलालेखोमे भी, जिनका अधिकाश भाग बारहवी शताब्दीका है, उल्लेख मिलता है कि कुन्दकुन्दाचार्य हवामें ( आकाशमे ) अघर चल सकते ये । दवेताम्बरोके साथ गिरन।र पर्वतपर जो विवाद हुआ था, उसका उल्लेख आचार्य शुभचन्द्र ( ई० स० १५१६-५६ ) ने अपने पाण्डवपुराण-+ में किया है । एक गुर्वावलीमे भी इस बातका उल्लेख है ।' इतना तो निर्चित है कि दोनोमे-से कोई भी दन्तकथा हमें ऐसी जानकारी नहीं कराती जिसे ऐतिहासिक कहा जा सके । उनमें थोडी- बहुत जो बातें है, उनमें भी दोनो दन्तकथाओमे मतभेद है । बाको भाकाशमे उडनेको और सीमन्घर स्वामीकी मुलाकातकी बात कोई खास मतलबकी नहीं । अतएव अब हमे दूसरे भधारभूत स्थलोसे जानकारी पानेके लिए खोज करनी चाहिए । सद्रबाहुके दिव्य ? कुन्दकुन्दाचायने स्वय, अपने ग्रन्थोमे अपना कोई परिचय नही दिया । 'बारस अणुवेबखा' प्रन्थके अन्तमे उन्होंने अपना नाम दिया है, और 'बोधप्राभूत' ग्रन्थके अन्तमें वे अपने भापकों 'द्वादश अग-प्रन्योके ज्ञाता तथा चौदह पूर्वोका विपुल प्रसार करनेवाले गमकगुरु श्ुतज्ञानी भगवान्‌ भद्रबाहुका शिष्य' प्रकट करते हू । “बोघप्राभूत' की इस गाथापर श्रुत- सागरने ( १५वी शताब्दीके अन्तमे ) सस्कृत टीका लिखी है । अतएव इस गाथाकों प्रक्षित गिननेका इस समय हमारे पास कोई साधन नहीं है। दिगम्बरोकी पट्टावछीमे दो भद्बाहुओका वर्णन मिलता है । दूसरे भद्रबाहु २ देखो-जैनदितेषी पु० १० पृ० ३७२ ।




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