कुन्दकुन्दाचार्य के तीन रत्न | Kundakundaacharya Ke Tin Ratn

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Kundakundaacharya Ke Tin Ratn by गोपालदास जीवाभाई पटेल - Gopal Das Jeevabhai Patel

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१६ कुन्दकुन्दाचार्यके तीन रत्न प्रतिष्ठित हए; भौर बावन वषंतक उस पदपर रहकर ८५ वर्षके आस-पास निर्वाणको प्राप्त हुए। भिन्‍न-भिन्‍न पट्टावलियोंमें वर्षके ब्योरेमें अन्तर है । जैसे - एक पट्टावलीमें बतलाया गया है कि ई० स॒० ९२ में ( वि० स० १४९ ) उन्होने भावायं पद श्माप्त क्रिया था । “विद्वज्जनबोधक में उद्धृत एक इलोकमें बतलाया गया है कि कुन्दकुन्दाचायं महावीरके बाद ७७० वें वर्षमें अर्थात्‌ ई० स० २४३ में जन्मे थे। उसमें यह भी लिखा है कि तत्त्वार्थयूत्रके कर्ता उमास्वाति उनके समकालीन थे । परन्तु सबसे पहली बतलायी परम्परा ही अधिक प्रचलित है । भिन्‍न-भिन्‍न भ्रन्थों और लेखोंके प्रमाणके आधारपर कुन्दकुन्दाचार्यका समय कितना निश्चित किया जा सकता है, यह अब देखना चाहिए। सबसे प्राचीन दिगम्बर टीकाकार पूज्यपाद स्वामी अपने सर्वार्थसिद्धि ग्रन्थ ( २।२० ) मे पाँच गाथाएँ उद्धृत करते हैं। वे पाँचों ही गाथाएँ उसी कमसे, कुन्दकरुन्दाचायके बनारस अणुवेक्खा' (२५।२९) ग्रन्धमें पायी जाती ই। पूज्यपाद पांचवीं शताब्दीके मध्यमे हो चके ह; अतएव कुम्दकुन्दाचायं इससे पहले ही हो चुके हैं, इतना तो निश्चित ही हो जाता है। फिर शक ३८८ अर्थात्‌ ई० स० ४६६ के मरकराके ताम्नलेखोंमें छह आचार्योंके नाम हैं और बतलाया गया है कि यह छहों आचार्य कुन्दकुन्दाचार्यकी परम्परा ( कुन्दकुन्दान्वर्या ) में हुए हैं। किसी आचार्यका अन्वय, उसकी मृत्युके तत्काल बाद आरम्भ नहीं होता । उसे आरम्भ होनेमें कमसे कम सौ वषं ल्ग जाते हैं, ऐसा मान लिया जाय और यह छह आचार्य एकके बाद दूसरेके क्रमसे हुए होंगे, यह भी मान लिया जाय तो कुन्दकुन्दाचार्य- का समय पीछेसे पीछे तीसरी शताब्दी ठहरता है। कुन्दकुन्दाचायके 'पंचास्तिकाय' ग्रस्थकी टीकामें जयसेन ( बारहवीं शताब्दीका मध्य भाग ) कहते हैं कि कुन्दकुन्दाचार्यने वह ग्रन्थ 'शिवकुमार महाराज के बोघके लिए लिखा था। शिवकुमार राजा कौन है इस विषयमें बहुत मतभेद है। दक्षिणके पल्‍्छव्वंशर्मे ईशिवस्कन्द नामक राजा




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