हिंदी के गद्धकार और उनकी शेलियाँ | Hindi Ke Gadyakar Aur Unki Shailiyan
श्रेणी : साहित्य / Literature

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Add Infomation AboutRamgopal Singh Chauhan
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
39 MB
कुल पष्ठ :
265
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)हिन्दी-गय का पूर्व ब्ृतत
साहित्य अथवा किसी श्रन्य कला का कोई रूप झ्नायास दही एक दिन
जन्म नहीं ले लेता, वरन् उसकी एक निश्चित परंपरा होती है । वह एक
सतत् विकास का प्रतिफलन होता है, जो एक निश्चित पूर्वपीठिका के श्राधार
पर क्रमशः विकास आर परिवर्तन के श्रालोढ़न-प्रत्यालोड़न द्वारा एक समय
विशेष पर जा कर नितान्त नूतन आर अभिनव रूप धारण कर तेता है; जो
अपने पुरात्न रूप से सबंधा भिन्न श्र नवीन होता है । समस्त शलाओं के
' विकास की यही सतत् घारा है । शपनी परंपरा से दृटाकर उसका श्रध्ययन
भ्रममूलक होता है । उसके भावी विकास के बीज उसके पूव काल की स्थिति
में खोजने चाहिए । तभी दम समय विशेष में उसके विकसित, नवीन-झभिनव
रूप को सही रूप में समभऋ--परख सकते हैं, और उसकी गति का सही विवेचन
कर सकते हैं । हिन्दी गद्य-साहित्य के विकास का भी थी क्रम रहा है । वह
एक समय विशेष की झाकर्मिक उपज नहीं है ।
किन्तु प्राय: हिन्दी साहित्य के इतिहास के विवेचन में हिन्दी-यशथ-
साहित्य से झ्राधुनिक गद्य-साहित्य का ही बोध होता है, श्ौर हिन्दी गय को
अंग जों के भारव-झागमन के पश्चात् डी उनके प्रभाव-जन्य श्रौर उद्योग-
जन्य उपज माना जाता रहा हूं । यह सत्य नहीं । डिन्दी-गद्य-साहइित्य की भी
निश्चित पूवपीठिका है, और वह निरंतर विकास करता हुआ भारतेस्दु काल
में भाषा तथा . साइित्य दोनों ही इष्टियों से एक निश्चित और विकसित
रूप को प्राप्त कर सका | तब से वह निरन्तर विकास-रत है। उसके
इस विकास क्रम को भली भाँति समभकाने के लिए श्रावश्यक हे उस पूव धीठिका
का इतिवृत्त जान लेना ॥
इसमें सन्देह नहीं कि यच्य में साहित्य के विभिन्न झंगों, विधिध विषयों
तथा शैलियों का सम्यक रूप से श्रारम्भ भारतेन्दु के समय से होता है श्रौर उस
पर निश्चित रूप से शअंग्र जी साहित्य तथा बंगला, मराठी श्रादि श्रन्य प्रान्तीय
भाषाओं का प्रभाव पड़ा था |
यहाँ पर यद्द स्पष्ट कर देना भरी ठीक होगा कि जिसे इम श्राधुनिक
डइिन्दी गद्य या खड़ी बोली का झद्य साहित्य कडते हैं वदद निश्चित रूप से
भारतेन्दु के समय से विकास करता है, क्योंकि पूवकालिक गद्य झपसी प्रान्तीय
बोलियों में हो था झौर उसका साहित्यिक महत्व भी न था !
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