प्रयाग - प्रदीप | Prayag - Pradip

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(१०. )भ करते तो इस की बिखरी हुई सामग्री का पुस्तकाकार होना ही झसंभव था । उन के सुयेग पुत्र प्रोफ़ेसर ढाक्टर घीरेंद्र वर्मा एम० ए० ढी० लिट्० ( पेरिस ) तथा प्रोफ़ेसर डाक्टर बाबूराम सकसेना एम० ए० ढी० लिट्० ( प्रयाग ), पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय एम० ए०, प्रोफ़ेसर रघुबर मिट्दूलाल शाख्री एम० ए०, सरस्वती-संपादक पंडित देवीदत्त शुक्ल झादि सज्जनां से भी विशेष सहायता मिक्नी है। प्रोफ़ेसर ढाक्टर रामप्रसाद त्रिपाठी एम० ए० ढी० एस-सी० ( लंदन ) ने तो श्रध्यापन तथा शझन्यान्य साइित्यिक कार्यों से समय न होने पर भी एक विस्तृत प्राक्षधन लिखने की कृपा की है । झतः मैं इन सब मदानुभावों का झत्यंत ध्ाभारी हूँ ।इन के श्रतिरिक्त दो सब्जन श्र भी घन्यवाद के पात्र हैं । एक ते रायबहादुर पंडित श्रजमाइन व्यास सेक्रेटरी डिस्टिक्ट शारकियालोजिकल सोसाइटी इलाहाबाद, जिन की सहायता से इस पुस्तक के प्रकाशन की व्यवस्था की गई है, दूसरे हिंदुस्तानी एकेडेमी के दविदी-विभाग के लिटरेरी श्रसिस्टंट श्रीरामचंद टंडन एम० ए०, एल ० एल० बी० जिन्होंने इस पुस्तक की छुपाई तथा प्रफ़ संशोघधनादि में विशेष परिश्रम किया है ।कुछ झनिवायं कारणों से पुस्तक के प्रकाशित होने में बिलंब हुशा है, धतएव पुस्तक में दिए हुए झाँकड़े पुराने दो गए हैं । परंतु उन से जो निष्कष' निकलते हैं उन में झंतर न समकना चाहिए ।ध्रीप्रयागराज ) शालिग्राम श्रीवास्तव विजयादशमी, सं० १६३३:काया ऋण




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