युधिष्टिर | Yudhishthir

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Yudhishthir by कृष्ण गोपाल - Krishan Gopal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दूसरा अध्याय दर वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि कपड़ों का एक सुंदर नगर-सा बना हुआ है। जगह-जगह फ़ौवारे चल रहे हैं, और सुंदर फूल-बारा बने हुए हैं। यह हृश्य देखकर पांडवों को बढ़ा आनंद हुआ | थोड़ी देर सैर करने के बाद युधिषिर सब भाइयों के साथ भोजन करने बेठे । उनके साथ कौरव भी जीमने बैठे । भोजन में अनेक प्रकार की चीजें बनाइ गई थीं । उनका स्त्राद ले-लेकर वे लोग आपस में ,खूब प्रशंसा करने लगे । जिसे जो चीज़ अच्छी लगती, बह दूसरे को दे देता था । इस तरह देन- लेन में दुष्ट दुर्योधन ने विष-मिंली मिठाई थीमसेन को दे दी। सीस को दुर्योधन पर किसी प्रकार का संदेह तो था ही नहीं, उन्होंने वह मिठाई बड़े शौक से खा ली। यह देख दुर्योधन सन-ही-मन खूब प्रसन्न हुआ । उसने समझा कि मेरा मतलब सिद्ध हो गया है। अस्वु, भोजन हो जाने पर कौरवों ओर पांडवों ने सिलकर बड़े आनंद से जल-बिहार किया । जल का खेल खेलते-खेलते संध्या हो गद। सबने जल से निकल-निकलकर अपने कपड़े आर गहने पहने । परंतु जहर के प्रमाव से भीससेन गंगा के किनारे ही बेहोश होकर पड़े रहे 1 उनको किसी प्रकार की सुघबुधघ न रही । यह बात और कोई नहीं देख पाया, सिफ़ें दुर्योधन दही जानता था । जब उसने देखा कि भीमसेन बिलकुल होश में नहीं हैं, तो वह उनके पास गया और हाथ-पाँव बाँधकर उन्हें गंगा में डुबो आया | _ बांगा के सीतर-ही-भीतर सीमसेन नागलोक में पहुँचे । वहाँ सर्प




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