राजनीति से दूर | Raajniti Se Door

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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घ राजनीति से दूरथेमें थोड़े दिन और 'खाली' में ठहरा रहा, किन्तु एक अस्पष्ट अद्यान्ति ने मेरें दिमाग को जकड रखा था । आदमी की दाठता से अछूतें, सुनसान और अज्ञेय उन सफ़ेद पहाड़ों को देखते-देखते मुभे फिर से शान्ति महसूस हुईं। आदमी चाहे कुछ भी क्यों न करे, वे पहाड तो वहां रहेंगे ही । अगर बतंमान जाति आत्म-हृत्या कर ले, या और किसी धीमी प्रक्रिया से गायब हो जाय तो भी वसन्त आकर इन पहाड़ी प्रदेशों का आलिंगन करेगा ही, चीड-वृक्षों के पत्तों में लडखडाती हुई हवा भी बहा ही करेंगी और पक्षियों का संगीत भी चलता ही रहेगा।परन्तु उस समय तो अच्छी या बुरी कोई भी छुटकारे की राह न थी । आगे हो तो हो । कुछ हृद तक सक्रियता में ही छुटकारा था । चाहे जेसी भी हो, *'खाली' दिमाग को राहत नहीं दे सकती थी और न दिल में विस्मृति भर देने की दवा ही दे सकती थी ! सो वहां पहुंचने के ठीक सोलह दिन बाद मेंने 'खाली” से विदाई ली । विचार में खोकर मेंने उत्तर की सफ़ेद चोटियों को आखिरी बार बड़ी देर तक एकटक निहारा और उनके पावन रेखा-चित्र को अपने दिल पर अंकित कर लिया ।अप्रैल १९३८




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