चर्चर्यादि ग्रन्थ संग्रह | Charchyardi Granth Sangrah

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Charchyardi Granth Sangrah by जिनहरि सागर - Jinhari Sagar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मी चचरी दें अर्थ-हाँ पिधिचेलॉंमि श्रावक न ताम्दूल साते हे और न खाते हैं । जहाँ झुद्धनीति सपनन श्रावक लोग पेरोमे जूतेनहीं घारण करते । जहाँ न भोजन होता है, न सोना होता है; न अनुचित बैठना होता है न शस्योके साथ प्रयेश होता है और न गाली गछोज आदि दुष्ट बोलना ही होता है ॥२(॥ जहिं न हाहु न वि हुई न ख़िंड न रूसणड, कितिनिमिनतु न दिज्जइ जहिं घणु अपणउ । करहि जि बहु आसायण जहिं ति न मेलियहि, मिलिय ति केलि करति समाणु महेलियहिं ॥२२॥ अभे-जहाँ रिधिरौत्योंमि न हँसी मनाक की जाती और न दोड दो वद़ी जाती । न जुए भादि सेंढे जाते हे और न रोप ही किया जाता दे ! जहाँ बीर्तिफे लिये न अपना धन ही दिया ज्ञाता है, जो यहुत आसातना करते हैं, उन नटबिरोको न इकट्ठा ही किया जाता है । क्यो कि पैसे लोग कुचेटाओंसे खियोके साथ बीटा कुनूदल करने छगजाते हैं ॥२२॥ जहिं सकति न गहणु न माहि न सडलउ जहिं सावयसिरि दीसइ कियड न विंटलउ । ण्हबणयौर जण मिल्लिवि जहि न विभूसणउ सावयजणिहि न कीरइ जहिं गिहचिंतणउ ॥२३॥ अर्थ “जद न सकातिमे न प्रदण” में श्नान दान दी होता है न साथ मासमे महछ आदि की रचना दो की जाती है । जहाँ श्रापकोंफे सिरमे पगड़ा फेंटा आदि भी नहीं होता है । स्नान कराने वाछे मनुष्योंकी छोडकर दूसरे छोग जहाँ मिशेष-भूपण नहीं रफते हैं। जददीं श्रावंक लोग गूदच्यापारकी चिंता भी नददीं करते 1०३1 जहिं मलिणचेठगिहिं जिणवरु पहयइ म्रठपडिम सुश्भू वि छिवड न साबियट् । आरकचिड उत्तारिड ज किर जिणवरह तपि न उत्तारिग्जड वीयजिणेसरह ॥२४॥ अर्ध-हाँ पिधिचैत्योमे मलिन बस्तर एव मलिन शरीरसे जिनेश्वरदेव नहीं पूजे जाते। पवित्र हुई भी श्रारिका आकस्मिक सी शरीर धर्मके हो जानेसे महान अमर्थकी सभावनासे मूठ नायकतीवी प्रतिमाकों सपशं सदीं करती द। क्योंकि कददा भी हे--आउदिया- बुरा ््् वे अदगमे स्नान और दान करने पता है। कस ः्‌ री ही वि




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