श्री कुन्द कुन्द - वचनामृत | Shri Kund Kund - Vachanamrit

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
678 KB
कुल पष्ठ :
27
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)सरमग्दमयर निचले, नर. पे सिविल रे गिग नो८--अकता ।
पट्द्रव्यात्मक -लोक प्रकाशक,
, अर अलोक का जो ज्ञाता
रागदष क्रोधादि भाव का,ज्ञोतारे हे वह नहिं करता ।।
भावात्मक हो भाव” सदाका,
आत्म रूप ही प्रगट रहा ।
क्ीर नीरवत् देख व्यवस्था,
जिन-बरने व्यवहार कहा,
९--द्दान मोह
जीवरु पुदूगल द्रव्य सदाका,
आख्रवादि कुछ द्रव्य नहीं ।
पुण्य पाप भी द्रव्य कहां ! मति*---
वान, घिचारों बात सही ॥।
भावात्मक हो उदय आवता,
बिना-ज्ञान* क्यों भाता' है ।
यह मिध्यात्व सहज भावात्मक,
दशन-मोह कहाता है ॥१--छह द्रव्य । २--जाननेवाला । ३--जानता। ४--क्रोघादि
भाव । ५--बुद्धि । ६--ठीक । 8--अज्ञान । ८--अपनाता |
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