श्री तीर्थङ्कर-चरित्र [भाग २] | Shri Tirthankar-Charitra [Part 2]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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९कै,थातकी खरड द्वीप के पूर्वीय भाग के ऐरावत क्षेत्र में, श्रि्रा नाम की एक नगरी थी । वहाँ पद्मरथ नाम का राजा राज्य करता था, जिसने अपने पराक्रम से, अनेक राजाओं को जीत कर 'झपने वश कर रखा था । राज्य-सम्पदा से सम्द्ध होने पर भी, पद्यरथ, उसमें फँसा हुआ दी नहीं रद्दा, किन्तु मुक्ति-- लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिए उसने, समस्त ऋद्धि दृण के समान त्याग दी श्मीर चितरक्ष नाम के शुरु के समीप संयम में श्रवर्जित हो गया । प्रमाद रदित संयम की आराधना करने के साथ दी, ब्हन्त सिद्ध को भक्ति द्वारा तीथटर नाम का घन्ध किया । अन्त में, श्ाराधिक थो, प्राणत कर्प के पुप्पोत्तर विमान में, वीस सागर की स्थिति चाला उक्तप्ट देव हुआ ।श्रुतिम सब ।दाग हैजम्यू द्वीप के भरताद्ध में, सरयू नदी के किनारे, 'अयोध्यानाम की प्रसिद्ध एवं पवित्र नगरी हे । अयोध्या में; इंध्वाकुवंशके राजा सिंहसेन, राज्य करते थे । सिंदहसेन की रानी का नाम' सुयशा था, जो श्वसुर एवं पिता के वंश के लिए यश की मूर्ति के समान थी ।प्राणत देवलोक के सुख भोगकर 'त्रोर वहाँ का आयुष्य




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