दत्तात्रेय वृतांत - अथावधूत गीता | Duttatreya Vritaant - Athavadhoot Geeta

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अवधूतगीता by स्वामी परमानन्द जी - Swami Parmanand Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दत्तावियवृत्तान्त | (१७ दत्तात्रियजी कहतेद दे राजन्‌ ! मुंगी एक जीव होताहै सो एक कौटको पकड़कर अपने घोसलामें उसको लाकरके अपने सम्मुख , रखकर दाब्दकों करताहै । वह कीट उसी मंगीके शब्दको सुनकर मुंगीरूप होकर भर फिर तिस भंगीमें मोहका त्याग करके उडजाताहे तैसे हम मी इस देहमें आत्माका व्यान करके आत्मरूप होकर देहमें मोहको नहीं. करते हैं सो देहमें भोहका स्पागरुपीगुण हमने. मेंगीसे सीखाहे इसबास्ते तिसको भी हमने गुरु बनायाहै ॥ ९४ ॥ दत्तात्रेयजी कहतहैं-हे राजन्‌ ! मेरेको चौबीस गुरुओंसे परमा्थका बोध हुवाहै इसलिये मैं अब्र भपने स्त्ररूपमें स्थित हूं और आत्मानन्दको प्राप्त होकर जीबन्मुक्त होकरके संसारमें थिचरताहूँ इसीवास्ते में चिन्तासे रहित होकर ' और निर्ंद होकरके विचरताहूँ । दत्तात्रियजीके उपदेशसे राजाकों भी आत्मज्ञाकका ढाभ हुआ भीर राजा भी मोहसे रहित होकर अपने घरकों व्वढेगये और दत्तानियजी फिर मस्त हस्तीकी तरह आत्मानन्दमें मम होकर विचरनेठग । आठ महीना तो. दत्तात्रेयजी एक स्थानमें निरन्तर ही रहतेथे किन्तु जहाँ त्तहाँ रागसे रहित होकरके विचरते ही. रहतेथे और चर्पाऋतुके चतुर्मासमें निरन्तर एक स्थानमें रहजातेथे । सो चत॒र्मासमें जिन ९ स्थानोंमें उन्होंने निवास कियाहै बह स्यान आजतक उन्हींके नामसे प्रसिद्ध हैं और तीर्थरूप करके प्ूज भी जातेहे क्योंकि जिस २ त्यानमें स्थित होकर महात्मा छोग तप या निवास करतेहैं वदद स्थान ताथिरूप और दूसरोंको पवित्र करने वाला होजाताहै | दत्तान्रियजीका एक स्थान गोदाबरीके किनारेपर नासिकसे कुछ दूर है भीर दूसरा जूनागढसे तीन मील पर गिरनार पर्वतपर है, तीसरा कर्मीरके श्रीनगरशहरसे दो मीछ दूर एक पर्चतपर है और मी बहतसे स्थान उन्हींके नामसे प्रसिद्ध है श्रीस्वामी दत्तात्रेयजीके जीवनचारित्रसे यह वार्ता सिद्ध होर्ताहै कि जितना गुण जिससे जिसको मिलजाय वह उतने गुणका उसको गुरुमानठेबै और वह गुण गाहै व्यवहारकों सुधारनेवाला हो चाहै परमार्थकों सुधारनेवाछा हो और गुणका लेना सबसे उचित है, दोषका छोडदेना भी एक गुण है गौर कानमें फ्रैंक लगागर आजक्रठ 'जों गुर बनजातेहैं वह तो एक 'अपनी जीविकाकेवास्ते करते द्‌




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