ज्ञान गंगा भाग २ | Gyan Ganga Bhag 2

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Gyan Ganga Bhag 2  by नारायण प्रसाद जैन - Narayan Prasad Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ज्ञानगज्ञा ७ दूसरा भाग | अ | अक्र्ठ +भक़्लसे काम लिया तो भादमी संकटसे पार हो जाता है; बेवक़्फ़ी से काम लिया तो आफ़तमें फंस जाता है । -योगवाशिष्ट अकस्मात पहले एक बुनियादी बात बता दू कि ईश्वरके नज़दीक इत्तिफ़ाक़न्‌, अकस्माता तोरपर, कुछ नहीं होता । -्लोगफ़लो अति लि दानसे दरिद्रता भोर अति लोभसे तिरस्कार होता है। अति नाशका कारण है । इसलिए अतिसे सबदा दूर रहे । ( “अति सवत्र वजयेत ) । -शुक्रनीति ञ् | तिक्रम जो सजनोंका उतिक्रम करता है उसकी भायु; सम्पत्ति, यश, घम, पुफ्य, भाशिप,न श्रेय ये सब नष्ट हो जाते हैं । भागवत कि शी थु अतिथ सच्ची मेश्नीका नियध यह है कि जानेवाले सेहमानकों जदुदी रुख़सत करो जोर भाने चालेका स्वागत करो । -ना्दोमर




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