दिगंबर जैन | Digambar Jain

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Digambar Jain  by मूलचंद किसनदास कपाडिया -Moolchand Kisandas Kapadiya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सचित्र सास अकू 4 | साहा 9दकलकद01 हपडाक 58401 18 681 3783६ 21 02559668 8 8 5 2१658 51 8 2 कस है 0९ ३3 005 ३1:44 6 5.55 5 58316. 5 2६ 50 25 8158 8 5 सक3 हक 58 65 805 38 धउ कह 22. मांगें ' श्री 'नेदीश्वरकी ४. फीट' ऊंची प्मासन' प्रतिमा है। इसके फसमें श्री कहुललीका मंदिर हे है। प्रतिमा दयामवंण ५ फीट उंगची पासन दैे। इसके वाये' फांवमें पारस था ' सो किसीमे निकाल दियां दै-चिह्ठ दिखाई देता है ! फिर' राश्तेके पूर्व भागमें श्री आदिनांथस्वरामीकी पद्ट।तम प्रतिमा चार फीट ऊंची है । तथा पापमें ही पंचफमेछीकी प्रतिमा ४ फीट ऊंची है। भीतर जानेका रास्ता ढाई फीट चौड़ा इतना ही! ऊंचा था जो सन्‌ १९२३ में खुदवाकर बड़ा किया गया है, जिससे खड़े होकर जा सकते हैं । यह पहाड़ छोटे वृक्षोंसे ऐसा आच्छादित है कि अनान पुरुष यह नहीं जान. सकते कि यहां कोई भी मंदिर होंगे। नो छोग यहां आकर इन प्राचीन भव्य मंदिरोंका दर्शन करते हें वे प्रसन्न होकर मुक्तऊंठसे स्तुति करते हैं । उत्तर दिलशामें जमीनसे एक मील उँचेपर शिखरबंद मंदिर है जिसमें प्रतिमा नहीं है परन्तु चरण हैं | यह मंदिर १९ मीलसे दिखा है। कई लोग कहते हैं कि ३००-४०० वर्ष पहले जितूरमें जन राजा थे या राज्यमान्य श्रष्टिवये थे । ये नित्य इन मंदिरोंकी पूना करनेको आते थे जिसके लिये जिंतूरसे सुरंग ख़ुदबाई गई थी । सुरंगका चिह्न गांवके मंदिरमें मौजूद है । जिंतूर गांवको : जैनीनगर भी कहते थे । अनुमानतः अपभेश नाम जितूर होंगया होगा । औरंगजेब बादझाहके जमानेमें गांवके १२ मेदिर घराशायी होगये थे जिनके चिन्दद अभी दिखाई देते हैं । मंदिरके स्थानोंपर खुदवानेसे बड़ी २ प्रतिमा मिछती हैं। [ ७. किसी रें का “कहना है कि यह जिंतूर सॉमंशीः क्षत्री चारुसेनका बसामा हुआ है जिसकी माहिखिः काखिका 'पुराममें हैं ।- तथा! जिंद्रेखे ८' मीकार चारठाना' नामक 'गांवनें भी जेन मंदिरके चिह्न मौजूद हैं | मानस्तस्भ भी है; खुदकमेपर जेन विस्व भी मिलते हैं। बोगार जेन सोमबंती , क्षत्री' थे उप्कें 'एक जेन रानाझा किछाः ! ०» मील बंधा हुआ था निसके चिह्न'मातम- होते हें | ऐतिहासशोंकों इसकी क्शिष खोन करनी चाहिये ।: वतेमानमें जितुस्में २० घर जेमियोंके हें य '९' मंदिर हैं। स्वर्गीध: दानबीश सेठ मालिकंदणीके भतींजे श्री ० सेठ तरावद नवकचन्दनी वीर से० २४४९ ई०सन्‌ ! ९२ ३में जितूर पषारे थे तब नेमिर्गिरिकी बंदना करके. ब निरीक्षण करके कह गये थे कि इम इसका कुछ जीरणों- दर कर देंगे ( जेनमित्र वषे २४ अंक ३९ ) अतएव सेठ तार।चन्दनीकों इल बातपर अबप्म लक्ष देना चाहिये। हम आशा करेंगे कि. ब०.. महावीरप्रतादनी इस अतिशमकषेत्रकों विशेष प्रतिद्धिगें लानेके लिये पृण उथोग करते रहेंगे । (४) श्री आयुर्वेदाचाय प० सत्यंघरणी जैन वैद्य, काव्यतीथ-छपारा-आपका नन्म परबार जातिमें से ० १९५ ६में सनाई (सागर) में हुआ था । पिताका नोम' छोटेलाठभी था तथा आपका प्रभम नाम चुलीलाछ था। मापकों ४ बर्षकी मायुर्में पिताका बियोग होगया था | जिससे काकाक़े पास रददने कगे थे । गरीबीके कारण आपको बहुत तकलीफें उठ।नी पढ़ीं, फिर




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