सर्वोदय की बुनियाद शांति - स्थापना | Sarvoday Ki Buniyad Shanti Sthapana

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Sarvoday Ki Buniyad Shanti Sthapana by हरिभाऊ उपाध्याय - Haribhau Upadhyay

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हरिभाऊ उपाध्याय का जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन के भवरासा में सन १८९२ ई० में हुआ।

विश्वविद्यालयीन शिक्षा अन्यतम न होते हुए भी साहित्यसर्जना की प्रतिभा जन्मजात थी और इनके सार्वजनिक जीवन का आरंभ "औदुंबर" मासिक पत्र के प्रकाशन के माध्यम से साहित्यसेवा द्वारा ही हुआ। सन्‌ १९११ में पढ़ाई के साथ इन्होंने इस पत्र का संपादन भी किया। सन्‌ १९१५ में वे पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आए और "सरस्वती' में काम किया। इसके बाद श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के "प्रताप", "हिंदी नवजीवन", "प्रभा", आदि के संपादन में योगदान किया। सन्‌ १९२२ में स्वयं "मालव मयूर" नामक पत्र प्रकाशित करने की योजना बनाई किंतु पत्र अध

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शांति का विचार श्द न हो सका, तो फिर या तो श्राप अ्रदालत में जायेंगे, या श्रापस में किसीको पंच बनाकर उसके सिपुर्दं मामला कर देंगे श्रौर उसके फंसले को मंजूर कर लेंगे । श्रदालत भी एक तरह का शांति-माग ही है । परंतु उसमें कान न-कायदे जाब्ते की इतनी उलझनें बढ़ गई हैं ब्रौर कागजी लिखावट व सबूत का इतना झमेला हो गया है कि न तो न्याय जल्दी मिल पाता है, श्रौर न सही न्याय ही बहुत बार होता है । श्रतः पंच-फंसले का साधन अ्रदालत से ज्यादा सुगम, सस्ता श्रौर सही न्यायदायी है श्रौर हो सकता है । यह प्रणाली केवल घर श्रौर संस्था ही नहीं, समाज, राष्ट्र श्रौर विदव की व्यवस्था तथा शांति के लिए भी उपयोगी श्रौर हितकर होगी । यह इतनी कटिन भी नहीं है । तो हमें आज से ही इस प्रणाली को प्रचलित कर देना चाहिए । इसमें किसी कानून-कायदे जाब्ते का विज्षेप सवाल नहीं है-- दोनों पक्ष जिसको ठीक समझें, जिनपर विष्वास हो, ऐसे को पंच बना ले । बस इतना ही करना होगा । पंच भी दो तरह से बनाये जा सकते है--दोनों पक्ष मिलकर किसी एक व्यक्ति को चुन लें--या दोनों भ्रपने-भ्रपन विदवास का एक-एक व्यक्ति चुन ले श्रौर उन दोनों में मतभेद हो तो वे दोनो एक तीसरे निप्पक्ष श्रादमी को सरपंच बनालें श्रौर उसकी सहायता से निणय करले । इसकी श्रौर श्र भी विधियां बताई जा सकती हैं । कितु मूल बात यह है कि हम या तो शभ्रापस में समझौता कर लेंगे, या पंच-फंसले का सहारा ले लगे । किसी भी दशा में हम गाली-गलौज या मारपीट--हिसा पर उतारू न होंगे । इस तरह यदि हम प्रारंभ में ही सावधान रहेंग, इस प्राथमिक विधि पर चलेंगे तो फिर शभ्रागे बड़े झगड़े श्र उपद्रव झ्रपने-श्राप रुक जायेंगे । शत: शांति-स्थापना के लिए सबसे पहल यही कदम उठाया जाना चाहिए ।




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