धर्म के दस लक्षण | Dharm Ke Dash Lakshan

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Dharm Ke Dash Lakshan by हुकुमचन्द भारिल्ल -Hukumchand Bharill

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दशलक्षण महापवे [] श्र सकता, पनप नहीं सकता, भ्रथवा इन दोनो के बिना सम्यक्चारित्र की सत्ता की कल्पना भी नही की जा सकती है । यद्यपि-लोक मे बहुत से लोग आत्म-श्रद्धान और झ्रात्म-ज्ञान के बिना भी बघन के भय एवं स्वमं-मोक्ष तथा मान-प्रतिष्ठा श्रादि के लोभ से क्रोघादि कम करते या नही करते-से देखे जाते है, तथापि वे उत्तमक्षमादि दशधर्मों के धारक नही माने जा सकते हैं । इस संबंध में महापडित टोडरमलजी के विचार दृष्टव्य हैं - “तथा बधादिक के भय से भ्रथवा स्वर्गं-मोक्ष की इच्छा से क्रोधादि नही करते, परन्तु वहाँ क्रोधादि करने का अभिष्राय तो मिटा नही है । जैसे - कोई राजादिक के भय से अथवा महतपने के लोभ से परस्त्री का सेवन नही करता, तो उसे त्यागी नहीं कहते । वैसे ही यह क्रोघादिक का त्यागी नही है । तो कंसे त्यागी होता है ? पदार्थ झ्रनिष्ट-इष्ट भासित होने से क्रोघादिक होते हैं, जव तत्त्वज्ञान के श्रम्यास से कोई इष्ट-्रतिष्ट भासित न हो, तब स्वयमेव ही क्रोधादि उत्पन्न नही होते; तब सच्चा घर्मे होता है ।”* इसप्रकार सम्यग्दर्शन श्रौर सम्यग्ज्ञानपुर्वंक क्रोघादि का नहीं होना ही उत्तमक्षमादि धर्म है । यद्यपि उक्त दशधर्मों का वर्सुन शास्त्रों मे जहाँ-तहाँ मुनिधमें की श्रपेक्षा किया गया है, तथापि ये धर्म मात्र मुनियो को धारण करने के लिए नही हैं, गृहस्थो को भी झपनी-श्रपनी भूमिकानुसार इन को श्रवश्य धारण करना चाहिए । घारण क्या करना चाहिए, वस्तुत वात तो ऐसी है कि ज्ञानी गृहस्थ के भी अपनी-अपनी भूमिकानुसार ये होते ही हैं, इनका पालन सहज पाया जाता है | तत्त्वार्थसूत्र में गुप्ति, समिति, अनुप्रेक्षा (बारह भावना) आर परीषहजय के साथ ही उत्तमक्षमादि दशधर्मों की चर्चा की गई है ।* ये सब मुनिधम से सवधित विषय हैं । यही कारण है कि जहाँ-जहाँ इनका वर्णन मिलता है, उसका उत्कृष्टरूप का ही वरन मिलता है । इससे श्रातकित होकर सामान्य श्रावको द्वारा इनकी उपेक्षा सगत नही है । १ मोक्षमा्मंप्रकाशक, पृष्ठ २२८ * स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्ञापरिपहजयचारित्रे (श्र० € सुत्र २)




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