विनोबा - दर्शन | Vinoba - Darshan

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Vinoba - Darshan by काका कालेलकर - Kaka Kalelkar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[९ | षण, साधारण मानवकों ललचनिवाली मदत्वाकांक्षाएं इन सब जजीरोंके तोड़ते जानेमें ही श्री विनोबा सुख अनुभव करते रहे। उन्हें उस दिक्षाकी तालाश थी, जिसके लिये कहा गया है-- “सा विद्या या विमुक्तये ।' सबसे पहले विनोंबा फिर उनके शेष दोनों भाई भी, लोक-साधनाके महत्तर आदर्शोकी प्राप्तिके लिए घर छोड़ कर चल दिये । योग्य मार्ग-दर्शककी खोज में, दीघे और तीखे मानसिक सघषाक बाद विनेबाजी सन १९8६ में घर छोड़ कर काशी पहुंचे । महात्मा गांधी साबरमती आश्रम स्थापित कर चुके थे । पत्र लिख कर अपने सहात्माजीसे आश्रम आनेकी अनुमति चाही । किन्तु प्रतीक्षा सहन नहीं हुई । बिना अचुमति प्रापी किये, मेहमान नहीं अतिथिके रूपमें, श्री. विनायक साबर- मती पहुंचे । मदात्माजीने अपने आश्रमके प्रारम्भमें ही मानो इस छोटे- से सिद्ध विनायकका स्वागत किया । अपराजिता आय परम्परा अपना नन्हासा रूप घर कर मानों सिंद्धियोंका भण्डार महात्माजीकी साधनाकी गोद सैंपने आयी । आश्रमवासी विनायकेन आश्रमके कर्मठ और कठोर अनुशासनोंकी तपनसे गुजरनेके लिए अपने मन और शरीरको उसी तरह फेंक दिया जिस तरह प्राचीन ऋषि-पुत्रॉंकि, परिचयां-व्यस्त, साधना-मय जीवनकी कहानी हम उपनिषदो्म पढ़ा करते हैं। आज भी विनोबा शरीर-श्रमकों बहुत महत्व देते हैं। उस दिन दिलीके राजघाट पर प्राथना-सभामि उन्होंने कद्दा, दारीर-श्रम छोड़नेसे ही दुनियां साम्राज्यशाददी और अन्य दाहियां पेंदा हुई हैं । श्रीर्वनायकका यह आश्रमवास कितना श्रद्धामय; तपोनिष्ठ एवं अध्ययनशील रहा--वह इस घटनासे व्यक्त होता है-- दुबल, अस्वस्थ शरीर विनायकके कठोर श्रमशील [किन्तु शिकायत- रहित चया और परिचयांसे प्राभवित महात्माजीने एक दिन पूछा-- “इतने दुबे हो रहे हो, फिर भी इतना सारा काम केसे कर लेते हो ! ” गिने-चुने दद्बोंमं अधादद गहराई लिये हुए. उत्तर थ--““काम करनेकी इच्छा दाकतिसे । *'




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