प्रेम दर्शन | Prem Darshan

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Book Image : प्रेम दर्शन  - Prem Darshan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( शेर ) शाखोंकि छुपण्डित तथा समस्त तरवोंकि ज्ञाता और व्याख्याता होकर भी अन्तमें नारंदजी भगवानकी भक्तिका ही उपदेश करते हैं । वाल्मीकि, व्यास, शुकदेव; प्रह्मद, ध्रुव आदि महान्‌ महात्माओंको भगवद्भक्तिमें गाते हैं। इतना ही नहीं, स्वयं वीणा हापमें टेकर सभी युगों और सभी समाजोगें निर्मय और निश्चित्त हुए सदा-सर्वदा भगवान्‌के पवित्र नामोंका गान करते हुए सारे विधके नर-नारियोंकों पवित्र और मंगवन्पुखी करते रहते हैं। इन भगवान्‌ श्रीनारदने अपने दो क्ल्पों- के न्वर्त्रिका कुछ खर्य वर्णन किया है । भागवतर्मे उक्त प्रसंज् बढ़ा ही छुन्दर है । अपने और पाठकोके मनोरन्नके छिये उसका कुछ मर्म नीचे दिया जाता है । दिव्यदष्टिसम्पन महर्षि व्यासजीने छोगोंके कल्याणके लिये बेदोंके चार विभाग किये । पश्चम वेदरूप नानाख्यानोंसे पूर्ण महाभारतकी रचना की । पुराणोंका निर्माण किया । इस प्रकार संग प्राणियोके कल्याणमें प्रदत्त होनेपर भी व्याल्मगवान्‌कों तृप्ति नहीं हुई, उनके चित्तमें पूर्ण दान्ति न हुई, उन्हें अपने अन्दर कुछ कमी-सी प्रतीत होती ही रही; तब वे कुछ उदास-से होकर सरखती नदीके तटपर बैठकर विचारने लगे-'मैने सब कुछ किया, तथापि मुझे अपने अन्दर कुछ अभावका-सा अनुभव क्यों हो रहा है १ क्या मैंने भागवतधर्माका विस्तारते निरूपण नहीं किया । क्योंकि भागवत धर्म ही परगेथर और परमहंस भक्तोंकिं प्रिय हैं । वे इस प्रकार सोच ही रहे ये कि हरियुण गाते असन्नवदन श्रीनारदजी”-- वहाँ आ पह़ेंचे । आवमगत और कुदालसमाचार पूछने-कहनेकी फ्




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