विद्यापति | Vidyapati

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Vidyapati by जनार्दन मिश्र - Janardan Mishr
लेखक :
पुस्तक का साइज़ : 8.56 MB
कुल पृष्ठ : 155
श्रेणी :
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जनार्दन मिश्र - Janardan Mishr

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३--विद्यापति का घम मिज्-मिन्न यग में हिन्दू समाज में शैव वैष्णव और शाक्त इन तीन मतों की प्रधानता रद्दी । इन तीनों सें से ही किसी एक को हिन्दू मानते आये हैं । तांत्रिक यग में शाक्तसत का कुछ अधिक प्रचार हुआ | शैंव और वैष्णव की वतंसान यग में प्रधानता है । भारत के जिस ग्रान्त में जिस मत के झाचाय उत्पन्न हुए उस प्रान्त में उनके उद्योग से वही मत प्रधान हुआ । दक्षिण में शैव उत्तर में वैष्णव तथा बंगाल और मिथिला में शाक्त- मत की प्रधानता थी । किन्तु ऐसा समभना भूल हे कि जहाँ जिस सतत की प्रधानता थी. वहाँ केवल उसी देवता की पूजा होती थी । यहीं कारण था कि दक्षिण में चेष्णव उत्तर में शैव और मिधिला तथा बंगाल में वेष्णव तथा शैव दोनों दी मत वाले सभी युर्गों सें बतंमान थे । दशनशास्त्र के साथ भारत के घम्मं का अथवा मतमतान्तरों का अदूसुत सम्बन्ध है । घ्म ओर दशंन एक दूसरे के साथ इस तरह मिते हुए हैं कि ये अलग नहीं किये जा सकते । यहद तिल तंडुल सा नहीं नीर-क्ीर का सम्मिश्रण हैं । जिस प्रकार कीर का आधार जल हू. उसी प्रकार दिंद-घ्म के स्वरूप का आधार दाशनिक सिद्धांत हैं ।




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