अजेय राष्ट्र भावना | Ajaai Rastra Bhawana

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Ajaai Rastra Bhawana by भगतशरण उपाध्याय - Bhagatsharn Upadhyaya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१ प्रजेय भारत मैंने भी कभी चीन से लौटकर उसके शभ्रतीत के बडप्पन पर किताबे लिखी थी--'लाल चीन, “'कलकत्ते से पीकिंग' ! किसने नहीं लिखा *? किसने चीन के उस तीखे जहर को नहीं पिया जिसकी ऊपरी सतह पर मधु तेरता था, भीतर जिसके हलाहल घुना था *? चीन से लौटते ही हमारे उदारचेता श्रप्र- तिम जननायक नेहरू ने क्लकत्त से ऐलान किया था कि चीन ने शान्ति के विकास मे गजब के कदम उठाये है, अपना देश भी समाजवादी विकास की झ्रोर डग मारेगा । उसी की देखा- देखी उन्होने सरकारी श्रफसरों का बद कोट के लेबास का भी विधान किया । झ्ौर उसी चीन ने, जिसके नर-चारियो के सिखाये, प्रदर्गनप्ररित स्वागत ने हमारे पडित का मन मोह लिया था, श्राज भारत पर हमला किया है ! मध्य एणिया के कुची मे जब भिक्षु कुमारजीव धर्म साध रहा था तब चीनियो ने हमला कर कुमारजीव को कैद कर लिया । कुमारजीव बोला--बिन मागा वरदान मिला, ले चलो उस देव को जहा भगवान के उपदेग के लिये मेरे ग्यारहो प्राण जागय्रत है । श्ौर हुगो के देश चीन मे छान्ति और दया के प्रवचन कहे कुमारजीव ने । इन गुरुवाक्यों का प्रतिफल ग्राज फल रहा है। चीन के हुणो ने भारतीय इतिहास के सुन- हरे युग को रीढ तोड दी भ्रौर बदले मे भारत ने चीन के पास शाति के दूत भेजे, श्रपने स्नेह के खोत खोल दिये जिससे देश पिये और पुष्ट हो ! मध्य एशिया की श्रगम्य मरुभूमि को भुख-प्यास से व्याकुल, खच्चरों की नसो के रक्त से प्यास बुभकाते भारतीय साधु हुणो के देश तुनहुवाग पहुंचते श्रौर वाणी




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