संध्या छाया | Sandhya Chhaya
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
1 MB
कुल पष्ठ :
107
श्रेणी :
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कुसुम कुमार -Kusum Kumar
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जयवंत दलवी - Jayvant Dalavi
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)जानी
जानाजानी
नाना
नानीनाना
नानी
जाना
नानी
नाना
नानी
नानानानीसध्याछाया 27है मोर खिडकी सेम्हादू को दंख लेते हैं । कुछ दामिदा
होकर वही सडे रह जाते हैं। म्हाट्ू, हाथ का खाली
लोटा लेकर अदर जाता है और जाते जातें नाना के
हाथ का भरा हुआ लोटा भी ले जाता है । नानी देखती
रह जाती है 1]बया हुआ ?(गुस्से से) क्या हुआ, कया ? कहे दना हु, इस उल्लू के पटठेका रौब नहीं चलने दूगा मैं--विसका * (हसती है।)इस इस स्हाट्ट का । सर फोड के रख दूगा साले कोपर वह तो आपके आराम के लिए ही करता है ना ? (हुसतीहै।)(उसकी हसी से चिढकर) हस मत, उल्टी योपडीहोन दो, आप यू कीजिएक्या *आज अच्छी घूप निकली है. हम यू करते हैं. सभी रेशमीसाडियों को घूप दिखाते हैं ।मैं ? सादिया घूप मे डलवाऊ ?क्यो हैरेलवे मे कतास घन भाडिटर था मैं ! तरी साडिया कोधूप दिखाऊ * रास्ता देखअच्छा ! मैं डालती हु घूप मे, आप जरा दो ट्रक तो खीच देंगेना
[नाना धीरे धीरे खाट की तरफ बढ़ते ह । भुक्कर एक
हाथ खाट पर रखत हैं। दूसरे हाथ से ट्रक खीचन ही
वालें हाते हैं कित्तमी अदर से म्हाद्वू आता है और
चट से ट्रव खीच वर नानी के सामने रखकर अंदर
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