चुनौती | Chunautii

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Chunautii by तकषी शिवशंकर पिल्लै - Takashi Sivasankara Pillaiभारती विद्यार्थी - Bharati Vidyarthi

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तकषी शिवशंकर पिल्लै - Takashi Sivasankara Pillai

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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४ चुनाती घूरन को उस दिन का अपना सारा झतुभव याद आया । सब बातें सविस्तार सो को सुनानी चाहीं । लेकिन सिंक्र इतना दी कहा, “ें किसी से कुछ मांग नद्दीं सकता ।”” सब फिर सोचने लगे । कुछ तय नहीं हो पाया । तब सूरी ने कुछ तय करने के लिये जोर दिया | महावीर ने कहा, “सुवद्द होसे के पहले ही हम अह्दाते के भीतर ही कहीं क्यों न गाड़ दें ?”” चरिता ने पूछा; “वह एक अपराध होगा न ?” महावीर--“कौन जानेगा ? हम वाहर किसी से नहीं कहें तो ठीक है ।” बतहू ने पूछा, “उस दिन भुजंगी की स्त्री को वहीं बड़े झाम के पेंढ़ के नीचें ही तो गाड़ा था ? चचा को भी वैसे ही गाड़ा जाय तो क्या हज है !”” स्वों को यह प्रस्ताव ठीक जंचा । वैसा ही करने का स्ों ने निश्चय किया । इस शत पर कि कोई बाहर किसी पर यह जाहिर नकरे। महावीर ने घूरन को उठाया । घूरन ने बाप की छोर देखा, ऐसा लगा मानो वह सो रहा हो । बद्दी उसकी चिन्ता करनेवाला एकमात्र व्यक्ति था । आगे “बापू” कहकर वह किसको पुकारेगा र कौन उसको “बेटा” कहकर पुकारेगा ? सब मिलकर शब को बाहर उठा ले आये और नहलाया ।. रव्बी का चेहरा मुस्कराता-सा दीखता था । दुःख से घूरन का हृदय फटने लगा । कफ़न के लिये उसके पास कपड़ा तक नहीं था । महावीर और बतहू दोनों ने मिलकर कपड़े का इन्तजाम किया । दो आदमियों ने फावड़ा लेकर गढ़ढ़ा खोदना शुरू किया । डिपो में कुत्ते जोर ज़ोर से भू कने लगे । गड़ढ़ा तैयार होने पर शव उसमें रखा गया । घूरन ने मुट्ठी भर मिट्टी उठाकर तीन बार गढ़्ढ़े




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