विज्ञान परिषद का मुखपत्र | Vigyan Parishad Ka Mukhapatra

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
96 MB
कुल पष्ठ :
428
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)श् विज्ञानपरमारुवीय शक्ति को लीला ही तारागणों की ज्योति तथा
सयं के प्रकाश व उष्मा का कारण है ।
. नई खोज
लाड रद्रफार्ड ने तत्वों को एक दूसरे में बदलने में
सफलता प्राप्त की । इस खोज की सहायता से ब्रिटेन के
ज्योतिर्विंद् (एसट्रोनोमर) सर श्राथर एडिग्टन, भौतिक
विज्ञानविद आर. एटकिंसन और जमंनी के भौतिकविज्ञान वेत्ता एफ० होटमन्स ने सय या -तारागण के .त्न्तकरण की स्थित का शोध काय॑ श्रारम्म किया ।
एटेकिंसन श्रौर होटमन्स के , काय से सन् १६२६ में यह
ज्ञात हुआ कि तारागणों में उच्च ताप श्र भारी दबाव
के कारण उनके इल्के तच्त्रों के केन्द्रकों में बड़े वेग से
क्रिया: होती . है, जिसके कारण ताप श्र प्रकाश उत्पन्न
होता है । हे
... सय के वाह्य तल पर ६००० सेन्टीऑ्रेड तापमान होने
का प्रमाण पाया जाता है । स्थिति, दबाव, गर्मी श्ादि
के श्रध्ययन से कहा जा. .सकेतां है किं ताप के क्रमशः
बढ़ते रहने के कारण सय के मध्य केन्द्र पर हमें दो-करोड़ अंश सेन्टीग्रेड तापमान होना ज्ञात होंता है श्रौरसयः के बृदृदाकार. होने के कारण दंबाव भी हमारे एक
ब्रंब साठ लाख वायुमंडल के दबाव के बराबर होगा ।
सूय में सदख्र गुना अधिक चमक वाले के केन्द्रीय भाग
का तापसानं- ३े करोड़ से० भ्रे० होने का अनुमान हैं
और धैँधलें दिखाई पड़ने वाले तारे के केन्द्र भाग में भी
श्के-करोड़ से० तापमान होने को अनुमान है । इससे
ज्ञात होता हैं कि सब झ्राकाशीय: पिर्डों ..के केन्द्र भाग
लसभग, एक समान प्रचन्ड तापमान पर हों सकते हैं ।
इतनी भारी गर्मी से क्या परिणाम होते होंगे, इसको
रोज भी की गई है
रहस्यसय श्रौर तारागणों के प्रचन्ड ताप का रहस्य
परमारुवीय शक्ति है । श्राधुनिक खोजों से यह जात हो
सका है कि सम्पूण सूय॑ पिंड का ६८३ प्रतिशत हाइ
ड्रोजन तत्व ही है श्रौर शेष अंग में ही अन्य लत्व हैं ।[_ '्रक्टूबरहाइड्रोजन का नाभिक एक धनारु वाला सृष्टि का
सबसे सरल रूप का लत्व है श्रौर उसी नामिक के भिन्न
मिन्न संयोग से अन्य तत्वों की रचना हुई है । अधिक
मात्रा में हाइड्रोजन होने का फल हम सृय की अग्नि
लीला में द्ाईड्रोजन का भाग लेने में देख सकते हैं ।गणना से मालूम किया गया है कि यदि चार हाई-
ड्रोजन परमाणु मिलकर एक हौलियम नाभिक (२ प्रोटीन- और २ न्यूट्रान) बनाते हैं तो एक झॉंस हाइड्रोजन से१६००० श्रश्व शक्ति उत्पन्न हो सकेगी जो ३०० दिनों
तक निकलती रहेगी । इस क्रिया में एक प्रतिशत”मात्रा
लोप.हो जाती है और यही मात्रा शक्ति में बदल जाती
है । इस प्रकार प्रति सेकिन्ड ४० [लाख टन मात्रा सय' «
में लोप होती रहती है श्रौर विकराल शक्ति. में बदलती
रहती है ।सूय में हीलियम के बनने. की क्रिया को निम्न रूप
से समझा जा सकता है :--इस वाद (7८०१४) को : १९.३६ में ..वीथे तथा
वीत्वैकर ने दिया था । कार्बन परमाणु के नार्भिक पर
हाईड्रोजन के नामिक प्रोटान वेग पूरण प्रहार करते हैं ।
इस क्रिया में काबंन नाभिक से एक हाईड्रोजन नाभिके
का संयोग होता है और १३ केन्द्रकार (७ प्रोटान श्रौर
६ न्यूट्रान ) का .श्रस्थाई ( एएश502016 ) परमाणु बन
जाता है जो पोजीट्रान निकलकर स्थायी ६ प्रोटान श्र
न्यूट्रान का परमाणु बनाता है जो काबन का सस-
स्थानीय.( आइसोटोप ) होता है । उधर फिर एक
प्रोटान आ. घमकता है । अब यह नया परमारणु १४ कण
का हो जाता है । जिसमें ७ प्रोटान और +७ न्यूट्रान होते
हैं और नाईट्रोजन नाम का स्थाई परमाणु बन जाता हैं ।
इस नाईट्रोजन परमारणु का फिर एक प्रोटान से संयोग
हो जाता है। शब यह श्रस्थाई रूप का १५ कण
८ प्रोटान और ७ न्यूट्रान का स्थायी रूप का झाक्सी-
जन परमारु होता है जो एक पाजीट्रान के निकलने से
१५. कण (७ प्रोटान श्र ८ न्यूट्रान) वाला स्थायी
नाइट्रोजंन परमार बनाता है। इसमें एक प्रोटान के
प्रहार करने पर खंडन होकर दो टुकड़े हो जांते हैं, एक
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