अम्बपाली | Ambapaali

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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| ७. | सड़कों पर कॉोलाहल था । लोग दुकानें सजा रहे थे । श्रेष्ठि ्यौर निगम की शोर से स्थान-स्थान पर द्वार खड़े किये गये थे । प्रत्येक द्वार पर एक विशेष प्रकार की कला का प्रयोग किया गया था । बडढकों की भेणी का द्वार लकड़ी का था; थपतियों की श्रेणी का द्वार सुन्दर पत्थर का, कम्मार श्रेणी का घातु का श्ञौर इसी प्रकार । तोरणों, बन्दनवारों और मधुघटों से सारा नगर एक अभिनव-वस्तु बन गया था | सहसा भीड़ में हलचल हुई । लोगों ने माग छोड़ दिया ओर किनारे हो गये । सेनानी की एक प्रधान अपने सफ़ेद घोड़े पर चढ़ा हुआ उधर से गुजरा था । उसने एक छोटा सा चाँदी का तूये निकाल कर बजाया । जनता उत्सुक होकर उसके पास बढ़ने लगी । उसने चिल्ला कर कहा -- “नागरिकों, एक आर हो जाओ । अभी परिषद इधर से आती है । वे लोग हिरण्यगभ के मंदिर की ओर जायेंगे । उन्हें कोई असुविधा न हो । सावधान !” और वह आरे बढ़ गया | जनता फिर सिमट आई | राजपथ फिर नरमुंडों से भर गया । फिर वही कालाददल, नही भाग-दोड़ । एक भिन्नु-श्रमण इधर से जा रहा था । उन दिनों वेशालली के बाहर आचाय प्रबुद्धकेतु ने एक बोद्ध संघाराम की स्थापना कर दी थी आर बौद्ध मिक्लुक जनता के लिये नितांत झ्ाश्चये की वस्तु नद्दीं रद्द गये थे । परन्तु उनक विषय में लोगों की जिज्ञासा अधिक जागृत नहीं थी । गणतंत्र होने के कारण जनता राजनीतिक अधिकारों और सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिये अधिक सतक थी । उसे यज्ञों और ऋणों में विश्वास थ। । वेशाली में इस एक हिरण्यगभ के मंदिर के अतिरिक्त




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