श्रीमद् राजचंद्र | Shrimad Rajchandra

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Shrimad Rajchandra by पं. जगदीशचन्द्र शास्त्री - Pt. Jagdish Chandra Shastri

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about पं. जगदीशचन्द्र शास्त्री - Pt. Jagdish Chandra Shastri

Add Infomation About. Pt. Jagdish Chandra Shastri

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
विषय-सूची ६५ पत्रांक थ पृष्ठ पत्रांक सा ३८१ आत्माका घम आओत्मामें ३५४ | ४१४ साधुको पत्र समाचार आदि ढिखनेका 2... ध्यान देने योग्य बात ३५५ विधान ३७६--९ ३२८२ शानी पुरुषके प्रति अधूरा निश्चय २५६ | ४१५ साधुकों पत्र समाचार आदि लिखनेका २८३ सच्ची ज्ञानद्शासे ढु खकी निवृत्ति ३५६ विधान ३७९६-८३ ३८४ सबके प्रति समर्दष्ट ३५७ | ४१६ पचमकाल--असंयती पूजा २८२ ३८५ महान पुरुषाका अभिप्ाय २५७ | ४१७ नित्यनियम २८२ ३८६ बीजश्ञान २५८ | ४१८ सिद्धातबोध और उपदेशवेध २८ ३-५ २८७ सुघारसके संबंधमे ३५८-९ | ४१९ संसारमें कठिनाईका अनुभव ३८६ २८८ इंश्वरेच्छा और यथायोग्य समझकर मौनभाव २६० | *४१९ ( २ )आत्मपरिणामकी स्थिरता २८६ ३८९ ** आतमभावना भावता ”' २६० | ४२० जीव और कर्मका सबंध ३६ ६-७ ३९० सुधारसका माद्दात्म्य २६१ संसारी और सिद्ध जीरवोकी समानता ३८७ ३९१ गाथाओँका झुद्ध अथे ३६१ | +४२० ( २) जैनदर्शन और वेदान्त ३८८ ३९२ स्वरूप सरल है ः २६१ | ४२१ वृत्तियोंकि उपशमके लिये निद्नत्तिकी २७ वाँ वर्ष आवश्यकता ३८८ २९३ शालिभद्र घनाभद्रका वैराग्य _. ३६२ | ४२२ शानी पुरुषकी आज्ञाका आराघन ३८९ ३९४ वाणीका संयम ः ३६२ अज्ञानकी व्याख्या के ८९-९० ३९५ चित्तका संक्षेपभाव क ६२ | ४२९ (२) “निसे जिणाण॑ जिदमवाण” ३९०-१ ३९६ कविताका आत्मायके लिये आराघन ३६३ | ४२३ सूदम एकेन्द्रिय जीवोंकि व्याघातसबधी प्रश्न ३९१ ३९७ उपाघिकी विशेषता ३६४ | ४२४ वेदात और जिनसिद्धातकी तुलना ३९२ ३९८ संसारस्वरूपका वेदन ३२६४ | ४२५ व्यवसायका प्रसंग ३९३ २९९ सब घर्मोका आधार शाति ३६४ | ४२६ सत्संग-सद्बाचन ३८ ३ ४०० कर्मके भोगि बिना निदत्ति नहीं ३६५ | ४२७ व्यवसाय उष्णताका कारण ३९३ ४०१ सुदर्शन सेठ 7 ३६५ | *+४२८ सद्गुरुकी उपासना ५ ४०२ “” शिक्षापन्न ३६५ | ४२९ सत्संगर्म भी प्रतिबद्ध घुद्धि 2९४ ४०३ दो प्रकारका पुरुषार्थ ३६५ | ४३० वैराग्य उपशाम आनिके पश्चात्‌ आत्माफे ४०४ तीर्थकरका उपदेश ३६६ रूपित्व अरूपित्व आदिका विचार 3५४ ४०५ व्यावहारिक प्रसगोंकी चित्र-विचिन्रता ३६७ ४३६१ पत्रलेखन आदिकी अदाक्यता ३४ ४०६ षट्पद ३६७-९ | ४३२ चित्तकी अस्थिरता इक *+४०६ (२) छद्द पद ३६९ चनारसीदासकों आत्मानुभत ३९५ ४०७ दो प्रकारके कम ३२७०-९४ प्रारूघका चेदन 2११ ४०८ संसारम अधिक व्यवसाय करना ४३३ सतपुरुपकी पिचान ३१ योग्य नहीं ३७१ | ४३४ पद आदिफे येचिने फिचारमेग उपयोग क४०८ ( २;३,४ ) यदद त्यागी भी नहीं ३७२ कि सन. डेट ०९ यहस्थमें नीतिपूवक चलना ३७२ ! ४३५ वाद्य सादादयफी सनिरण प+ १ ४१० उपदेशकी आकाक्षा ३७३ सिद्धोरी अपगारना उग्पनकाहण ४११ ' योगवासिष्ट * 3७३ ' पद पश्यन्यप और सिद्ेर्यन पर दो दिन एके ४१२ व्यवसायकों घटाना ३७३ “४३०७ व्ययहारणा रियर प*ं १३ चेराग्य उपशसकी प्रधानता इंउय. अर समाधान इतर ३८४५ रथ देने ममतयझा शनाप कक उपदेशशान और सिद्धातशान +४१३ (२) एक चैतन्य रुप किस तरह घटना ऐ है २७५ पा दे बग्गः श कि नल रन थे रास




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now