आर्य भाषाओं के विकास - क्रम में अपभ्रंश | Aarya Bhashaon Ke Vikash - Kram Men Apabhransh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( हे ) फ हे च्घ अपचश में साहित्यिक रचता हने लगी थी, यर्यपि अभी तक उस समय का कोई ग्रे थ उपलब्ध नहीं हुम्रा है । -्मामह भी ग्रपश्श से परिचित थे । ये छठी शताब्दी के ्न्त में वर्तमान थे । इन्होंने श्रपने 'काव्य' में लिखा है: '“शुल्दायों सहितो काव्यमु गद्य पद्य च तंदू द्विंधा 1 संस्कृत प्राकृत चान्यदपखश इति त्रिया भाभह के इस उस्लेख के ग्राघार पर, यह कहां जा सकता है कि छठी शताब्दी के अन्त तक झपभ्रश भी कांव्य-भापा माती जाने लगी थो परन्तु इससे यह नहीं पता चलता कि पहु भाषा किन लोगों द्वारा चोली जाती थी | श---महाकचि दरुडी ( वि० झाठ्वीं शती ) ने अपने समय की साहिर्यिक भाषायों में अपभ्रेश का भी नाम गिनाया है- 'प्ाभीरादिसिर: काल्येप्चपश्रश इति रंसूता: । शास्त्र तु, संस्कृतादन्यदू अपन शतयोदितम'” (काव्यादर्य १ परि० श्लोक ३६) दराडी के इस श्लोक के म्राघार पर यह निष्कर्ष मिंकाला जा सकता है: श-आभीरादि यिरा ही भ्रपन्नश थी | र--्काव्य में श्रपश्नश का प्रयोग प्रतिष्ठित हो गया था । ६--'कुबलयमाला” कथा के कर्तों दाक्षिरय चिल्ल वा उद्योतनसूरि ( जि० नवीं शत्ती ) ने अपनी कथा में अपन श पद का प्रयोग विशेष भापषा के अर्थ में किया है-- कि प्ि अवच्म॑सकया का वि य पेसायभासिल्ला'' (कुचलयमाला प्रारम्भ, हस्तलिखिंत घ्र० पा०) उ--रुदट ने ( वि० तवीं शहीं ) म्पने काव्यालंकार में भाषाओं के ६ भेद किए हैं “-- १, संस्कृत र. प्राकूृत रे. सागघ ४. पैदाची ४५. शौरसेनी ६. श्रपभ्श, जिसके देठा भेद के कारण कई भेद हो गये थे-- 'प्राकतसंस्कतमागधपिशाचशापाशच शोरसेनी च ! घष्ठोश्तर भूरिसेदो देशबविशेषादपश्नश । ” २.१२ इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मागधी भादि प्रांतीय भाषाओं के अतिरिक्त उन प्रांतों में भ्पभ्न शा भी कुछ मेद के साथ प्रचलित थी । महू उनकी तरहू केवल एकदेशीय होकर नहीं रह गई थी । प--राजदेखर--इनका समय भी नवीं शताब्दी हैं। राजशेखर ने बड़े कौशल से न केवल राजसभा में त्यित्त कवियों के स्थात का निर्देश किया क है, चरत्‌ संस्कुत झ्रादि भाषाग्रों के नचारस्वानों का उल्लेख भी कर दिया हैं । देखिए -- ः




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