साहित्य के त्रिकोण | Sahitya Ke Trikon

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२ विश्व-शाति के सन्दर्भ में खुद्धपरक साहित्य साहित्य का मुर घमं विपमता मेँ समता जौर अव्यवस्था मे व्यवस्था स्थापित करना है । इस व्यवस्था क्रम की सहज परिणति भखण्ड आनन्द अर अवाव शान्ति की प्रास्तिहै। शांति युद्ध क्य मन अर मानसिक विकायै का दमन है) युद्ध गीर गाति का सनातन सम्बन्ध रहा है} जव युद सत्‌-जसत्‌ व्रिचासें को लेकर केवल व्यक्ति के मनोजगत में हो चलता रहता है तव उसके झमन के लिए जिस सादित्य की रचना की जाती है वह सामान्यतः 'मक्तिपरक साहित्य है । उसमें मन ब्रह्माथित होकर नहा के साथ अपने विविध पारिवारिक सम्बन्ध जोड़ता है । कमी “राम की बहुरिया वनता है तो कभी 'हरि जननी मैं बालक तोरा” । कभी ब्रह्म के महत्व और अपने सघुस्व का वडा-चडा वरन कर आत्तिक सुख की प्राप्ति करता है तो कभी प्राकृतिक हदयी की चधिदाटता ओर मन्यता में तर्लीन होकर अपने आपको विस्मृत कर बैठता है । इस प्रकार के मक्तिपरक साहित्य की प्रक्रिया व्यक्ति से समाज की ओर उन्पुख होती है । उसमे स्वर्शाति और स्वमुख की प्रवानत्ता रहती है । विष्व के परिपादइव में उसे वहुत कम सोचने का अवसर सिलता है । मक्तिपरक साहित्य का अन्तिम लक्ष्य तो. विद्व-शातिं हो सकता है पर उस सक पहुँचने की उसकी गति बहुत वीमी, उसका रास्ता पेचीदा और लम्बा है । चू के विद्वजाति की समस्या औद्योगिक-क्राति और विगत दो मददायुद्धो की समस्या है, मत: उसकी प्राप्ति के लिए ब्रह्माश्रित भक्तिपरक साहित्य अपूर्ण मौर-सक्षम ठहरना है । घस स्थिति को पुरी तरह से आत्मसात करने के लिए मानवाश्रित युद्धपरक साहित्य की ही अनिवार्य आवस्यकता है ।




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