हिन्दी जैन साहित्य परिशीलन भाग 2 | Hindi Jain Sahitya Parishilan Bhag 2

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Hindi Jain Sahitya Parishilan Bhag 2 by नेमिचन्द्र शास्त्री - Nemichandra Shastri

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about नेमिचन्द्र शास्त्री - Nemichandra Shastri

Add Infomation AboutNemichandra Shastri

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
वर्समान काव्यधारा और उसकी चिसिश्च प्रबूत्तियाँ ३१ नह भककार विहाय रत्न के, अनूप रत्तघ्रप शूवितांग हो। तने हुए अम्बर अंग-ंग से, दिगम्बराकार विकार शून्य हो ॥ समीप ही जो परदेव दृच्य दे, नितास्त इवेताम्बर सा बना रहा। अप्रंथ निर्दग्द मदान संयमी, बने हुए दो निजधर्म के ध्वजी ॥ वस्तु-वर्णनमें महाकाव्यकी दृष्टि घटना-विधान, दृश्ययोजना और परिर्थिति-निर्माण--ये तीन तत्व आते हैं । वद्ध मानकी कथावस्तुरें प्रायः दृद्य-योजना तत््वका अभाव है । घटनाविधान और परिस्थिति-निर्माण इन दोनों तत््वॉकी बहुलता है । कथविने इस प्रकारका कोई दृश्य आयों- जित नहीं किया है जो मानवकी रागात्मिका छत्तन्तरीकों सदज रूपमें झकत कर सके । घटनाओंका क्रम मन्यर गतिसे बढ़ता हुआ आगे लता है. जिससे पाठकके सामने घटनाका चित्र एक निश्चित क्रमके अनुसार ही प्रस्तृत होता है । मददकाव्यकी आधिकारिक कथावस्तुके साथ प्रासंगिक कथावस्तुका रहना भी मददाकाव्यकी सफलताके लिए; आवश्यक अग है। प्रासंगिक कथाएँ मूलकथामे तीन्रता उत्पन्न करती हैं | बरद्धमान काव्यमे अवान्तर कथा रूपमें चन्दनाचरित, कामदेवसुरेन्द्र संवाद तथा कामदेव-द्वारा बद्धमानकी परीक्षा ऐसी मर्मस्पर्शी अवान्तर कथाएँ है, जिनसे जीवनके आनन्द और सौन्दर्यका आभास दी नहीं होता प्रत्युत सौन्दर्यका साक्षात्कार होने लगता है । जगत और जीवनके अनेक रूपी और व्यापारोपर विमुग्ष होकर कविने अपनी विभूतिको 'चमत्कारपूर्ण दंगसे आविसूंत किया है। मार्वोको




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now