निर्वासित | Nirwasit

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Nirwasit by इलाचन्द्र जोशी - Elachandra Joshi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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निवीसिक्त राष्ट्रीय लहर के साथ अपनी केसरिया साड़ियों को भी फहरा रही है! यह फैशन का तकाजा हूँ, जमाने की रफार है, या आन्तरिक प्रेरणा है ? पर उस रेशम-घारी सज्जन से उस आन्तरिक प्रेरणा का क्या सम्बन्ध ? ” इसी तरह की वातें सोचता हुआ वह स्टेशन पहुंचा । एक्के-वाले को किराया देकर विदा करने के वाद वह सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए । जव उसने स्टेशन के लिए एुक्का किया था तब वह वडी हड़वडी में था, पर अब जब वह स्टेशन पहुंच गया तव अपनी उस हडवड़ी का कोई कारण ही उसकी समन्न में नहीं भाया 1 उसे ऐसा लग रहा था कि उसके आगे अनन्त अवकाश है, जीवन में कहीं विस्सी प्रकार की व्यस्तत। नहीं हे, और उसके पास कोई काम करने, को नही है । पर उस अनन्त अवकाश की कल्पना उसे दिश्सी प्रकार भी सुखद नहीं मालूम हो रही थी । ऐसा मालूम होता था जैसे उसकी विरामहीन कर्मचेष्टा के सकल्प में विध्न डालनें के लिए किसी अज्ञात चक्र ने भाज एक भयकर पडयत्र रचा है । है। ण्दि ऐसा न होता तो उस जलसे में उसकी भेट नीलिमा से वयो होती, जहा उसके होने की किसी प्रकार की सम्भावना की कल्पना ही वह नहीं कर सकता था ? वहू अनमने भाव से एक नम्वर के प्लेटफार्म में गया भौर वहा निरुहदेश्य भाव से टहलने लगा । यात्रियों की एक वहुत बडी भीड़ प्लेटफार्म पर जमा थी । सम्भवत लोग किसी लम्बी सफरवाली गाडी के मानें की प्रतीक्षा कर रहे थे । दो-एक चक्कर छगाने के वाद उसने चाय के स्टाल पर जाकर एक कप चाय खड़े- खडे पी । चाय पी चुकने के वाद उसे इस वात की याद आई कि वह सुवह से भूखा है । अपनी अन्यमनस्कता में वह भूख के पीडन को भी भूला हुआ था । वह स्टार के भीतर जाकर एक बेंच पर बैठ गया और दो केक और दो समोसे माग वार खाने लगा । खाते हुए उसनें स्टालवाले से पूछा-“कानपुर के लिए गाड़ी किस समय मिलेगी ?” “सादे दस बजे ।” समय पूछने पर मालू+ हुआ कि अभी केवल साढ नौ यजे है । तब तो आज हू




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