स्म्यग्दर्शन | Saygdarshan Ac.1731

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Saygdarshan Ac.1731 by रामजी माणेकचंद दोशी - Ramji Manekachand Doshi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मानवजीवन का सहाकतंघव्य सम्यग्दरान कु दंसण मुलो घम्मी क १ सम्यपकूवकों नमस्कार हे. सर्वोत्क्ट सुखके ददेतुभूत सम्यग्दशन ! तुमे अत्यन्त भक्तिपूवक नमस्कार हो । ः इस झनादि संसार में अनन्तानन्त जीव तेरे आश्रय के बिना ब्रनन्तानन्त दुःखोंको भोग रहे हैं । तेरी परमकृपासे स्व -स्वरूपमें रुचि हुई, परम वीतराग स्वभावके प्रति हृढ निश्चय उत्पन्न हुआ, क़तकृत्य होनेका माग प्रदण हुआ । हे बीतराग जिनेन्द्र ! आपको श्रत्यन्त भक्तिपूवक नमस्कार करता हूं झापने इस पामरके प्रति अनन्तानन्त उपकार किये हैं । है. कुन्दकुन्दादि आचार्यो ! आपके वचन भी स्वरूपानुसंधान के लिये इस पामरकों परम उपकारभूत हुये हैं। इसलिये आपको परम भक्तिपूवक नमस्कार करता हूँ । सम्यग्द्शनकी प्राप्तिके विना जन्मादि दुःखोंकी श्रात्यंतिक निवृत्ति नहिं दो सकती । ( श्रीमदू राजचन्द्र )




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