रायचंद्रजैनशास्त्रमाला | Raychandrajainshastramala
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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
12 MB
कुल पष्ठ :
264
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)भशुद्ध,
ऐसा कद्दना
पीताकर
टृढयन्नाह
ज्ञापयितु-
प्राकारकी
भेदे नयं
क्योंकि ऐसा
है अहो
प्रकाशक
भेद
यय्याय
जम्भाई
भीत्या
जीवबा जीवा
स्यादवाच्य एवं
न्वार
पर्याय
“लि स्थात्
( बोघ )
तिनोंमें
अर्थ
अभिदको
दुर्णय-
विमुग््यत्वेन
युक्त: संमिता
अणुष्णा
दु्णे य-
श्र
तदा भासतां
सप्त श्रुताः
दुर्ण्णया:
जिसके हुए
क अभिप्रायसे जो
बहुवचन लगाकर
खीकार
शाख्नामें
को हमारे समानही होनेसे उन नयोंके
शुद्धिपत्रमू । .
युद्ध
ऐसा न कहना
पीताकार
द्रढयन्नाद
ज्ञापयितु
प्रकारकी
भिदनये
तथा यह
है ऐसा पूछते हो सो अद्दो,
प्रकाशके
भिदसे
पयोय
जम्माई
भिदा
जीवाजीवा
स्पाद्स्त्येव स्यादवाच्य एवं
चौथा
पयीयार्थ
तब **स्यात्,
(बोघ ) का
तीनोंमें
तथा
भिदको
दुर्नय-
विमुखत्वेन
प्युक्ता: संमता
अणुण्ण
दुर्नय-
तदाभासता
सप्तधरुताः
दुनेया:
जिसके कहे हुए
का जो अभिष्राय
तथा बहुचचन भी लगालेना चाहिये
स्वीकार
शाक्नों में
हमारे समानदी है इसलिये उसके
थ
पुर
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