रायचंद्रजैनशास्त्रमाला | Raychandrajainshastramala

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भशुद्ध, ऐसा कद्दना पीताकर टृढयन्नाह ज्ञापयितु- प्राकारकी भेदे नयं क्योंकि ऐसा है अहो प्रकाशक भेद यय्याय जम्भाई भीत्या जीवबा जीवा स्यादवाच्य एवं न्वार पर्याय “लि स्थात्‌ ( बोघ ) तिनोंमें अर्थ अभिदको दुर्णय- विमुग््यत्वेन युक्त: संमिता अणुष्णा दु्णे य-श्र तदा भासतां सप्त श्रुताः दुर्ण्णया: जिसके हुए क अभिप्रायसे जो बहुवचन लगाकर खीकार शाख्नामें को हमारे समानही होनेसे उन नयोंकेशुद्धिपत्रमू । .युद्धऐसा न कहना पीताकार द्रढयन्नाद ज्ञापयितु प्रकारकी भिदनयेतथा यह है ऐसा पूछते हो सो अद्दो, प्रकाशके भिदसेपयोय जम्माईभिदा जीवाजीवास्पाद्स्त्येव स्यादवाच्य एवं चौथापयीयार्थतब **स्यात्‌,(बोघ ) कातीनोंमेंतथाभिदकोदुर्नय-विमुखत्वेनप्युक्ता: संमताअणुण्णदुर्नय- तदाभासतासप्तधरुताःदुनेया:जिसके कहे हुएका जो अभिष्रायतथा बहुचचन भी लगालेना चाहिये स्वीकारशाक्नों मेंहमारे समानदी है इसलिये उसकेथपुर




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