कसाय पाहुडम [भाग ४ ] [थिडि विहत्ति] | Kasaya Pahudam [Part 4] [ Thidi Vihatti]

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Kasaya Pahudam [Part 4] [ Thidi Vihatti] by गुणधराचार्य - Gunadharacharya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(१० ) अनन्तानुबन्धी मान आदि तीनकी जघ्न्य स्थिति की मुख्यतासे सन्निकष जानना चाहिए. । अप्रत्याख्यानावरण क्रोधकी जघन्य स्थितिवाठेके चार संज्वछन और नौ नोकघायोंकी नियमसे अजघन्य असंर्यातगुणी स्थिति होती है । अप्रत्याख्यानावरण मान आदि तीन और प्रत्याख्यानावरण चतुष्ककी नियमसे जघन्य स्थिति होती है ) इसी प्रकार इन सात क्ायोंकी जघन्य स्थितिकी सुख्यतासे सन्निकर्ष जानना चाहिए, | स्त्रीवेदको जघन्य स्थितिवालेके सात नोकघाय और तीन संज्वलनोंकी नियमसे अजघन्य संख्यातगुणी स्थिति होती है और लोभसंज्वलनकी अजघन्य असंख्यातणुणी स्थिति होती है । नपुंसकवेदकी जघन्य स्थितिवालेके इसी प्रकार सन्निक्ष जानना चाहिए, । पुरुषवेदकी जघन्य स्थितिवालेके तीन संज्वढनोंकी अजघन्य संख्यात- _ गुणी स्थिति होती है और लोभ संज्वलनकी अजघन्य असंख्यातगुणी स्थिति होती है । दास्यकी जघन्य स्थितिवालेके तीन संज्वलन और पुरुषवेदकी अजघन्य संख्यातगुणी स्थिति होती है और लोभसंज्वछनकी अजघन्य असंख्यातरुणी स्थिति होती हे । तथा पाँच नोकषायोंकी जघन स्थिति होती है । इसी प्रकार पाँच नोकघायोंकी जघन्य स्थितिकी मुख्यतासे सन्निकष जानना चाहिए. । क्रोघसंज्वलनकी जघन्य स्थितिवालेके दो संज्वलनकी अजघन्य संख्यातगुणी और लोमसंज्वछनकी अनघन्य असंख्यातणुणी स्थिति होती है । मानसंज्वलनकी जघन्य स्थितिवालेके मायार्सज्वलनकी अजघन्य संख्यातगुणी और लोभसंज्वलनकी अजघन्य असंख्यातगुणी स्थिति होती है । मायासंज्वलनकी जघन्य स्थिति- वालेके लोमसंज्वलनकी अजघन्य असंख्यातगणुणी स्थिति होती है । लोमसंज्वलनकी जघन्य स्थितिवालेके अन्य प्रकृतियाँ नहीं होतीं । भाव--मुढ और उत्तर प्रकृतियॉंकी अपेक्षा सब्र औदयिक भाव है । अल्पबहुत्व--सामान्यसे मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थितिवाले जीव थोड़े हैं, क्योंकि उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध संज्ञी पश्चेन्द्रिय पर्यात्त मिथ्यादष्टि जीव करते हैं । इनसे अनुत्कुष्ट स्थितिवाले अनन्तगुणे है । कारण स्पष्ट है । जघन्यकी अपेक्षा मोइनीयकी जघन्य स्थि तिवाले सबसे थोड़े हैं, क्योंकि क्षपक सूश्मसाम्परायिक जोवके अन्तिम समयमें मोहनीयको जघन्य स्थिति होती है । इनसे अजघन्य स्थितिवाले जीव अनन्तगुणे हैं । उत्तर प्रकतियोंकी अपेक्षा यहां स्थिति अल्पबहुत्वका विचार किया दै जिसका ज्ञान अद्वाच्छेदसे दो सकता है, इसलिएयहांवदद नहीं दिया जाता है । इस प्रकार कुछ तेईस अनुयोगद्वारोंका आश्रय लेकर स्थितिविभक्तिका विचार करके आगे भुजगार, पदनिक्षेप; ब्ृद्धि ल्‍्फौर स्थितिसत्कर्मस्थान इन अधिकारोंका अवलम्बन लेकर विचार करके धस्थितिविभक्ति समाप्त होती है । इन अधिकारोंकी विशेष जानकारीके छिए मूछय्न्थका स्वाध्याय करना आवश्यक है ।




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