सौर जनजाति के सामाजिक एवं आर्थिक स्तर उत्थान में पंचायती राज की भूमिका एक समाजशास्त्रीय अध्ययन | Saur Janajati Ke Samajik Evm Arthik Star Utthan Men Panchayati Raj Ki Bhumika Ek Samajashastriy Adhyayan

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
347 MB
कुल पष्ठ :
323
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)परियोजनाओं तथा कार्यकमों के माध्यम से पैसा पानी की तरह बहाया गया है किन्तु
दुर्भाग्य यह है इसका कुछ प्रतिशत ही विकास कार्यों में खर्च हुआ है दमध्यप्रदेश के आदिवासी व्यवहार कुशल तथा प्रभावी समाज से दूर प्रायः वन्य
और पर्वतीय अंचलों के सुदूरवर्ती तथा अलग-अलग वस्तियों में निवास करते हैं वे
एक सुसम्बद्ध समुदाय में जीते हैं तथा उनकी संस्कुति, रीतिरिवाज, विश्वास तथा
भाषाएं विशिष्ट तथा विभेदक हैं। जब तक बाहरी सामाजिक शक्तियों ने इन्हें छेड़ा
नहीं था ये खुशहाल थे। इनका जीवन सरल, अकृत्रिम तथा आदिम हैं। इनका
विचरण ही नर्तन हैं और इनका भाषण ही गायन हैं। 'इस राज्य में राज्य सरकार
द्वारा घोषित 46 जनजातियों का उल्लेख मिलता है। किसी भी आदिवासी भाषा
संस्कृति और साहित्य का विकास आदिवासी समुदाय के चिरकाल तक किसी स्थान
पर स्थायी तौर पर बसने से जुड़ा है। इसके विपरीत यदि आदिवासियों को उनकी
भूमि से बेदखल कर दिया जाता है तो उनकी आजीविका का एकमात्र स्रोत विनष्ट
हो जाता है। परिणामस्वरूप उनके रीतिरिवाज, भाषा, साहित्य तथा आदिम विश्वास .
भी बेरहमी से कुचल दिये जाते हैं। अपनी प्रमुख कड़ी भूमि को गवां देने से.
आदिवासी निस्सहाय हो जायेंगे। आज वे नए प्रकार के खतरों से रूबरू हैं और वे
खतरे हैं ऐसी प्रत्येक वस्तु को खो देना जो उनके पास शताब्दियों से है। भाषा
संस्कृति, साहित्य और परिणामत: अपनी खास आदिवासी अस्मिता। इस प्रकार वे
प्रभुतासम्पन्न समाज की मूलधारा में निम्नजाति या दलित के रूप में डूब जाने के
लिए विवश कर दिए गए हैं। अब वे जंगलों के स्वतंत्र व स्वाभिमानी आदिवासी नहीं.
रह गए हैं। इस प्रकिया को “संस्कृतिकरण” कहने के बजाय “गैर आदिवासीकरण
कहना अधिक उपयुक्त होगा। जब मध्यप्रदेश की जनसंख्या के एक चौथाई
आदिवासी नहीं बचेंगे तब हमारे लिए वह दुर्दिन ही होगा। जाति समाज की भीड
उन्हें निगल जाएगी। आजाद भारत के संस्थापकों ने कभी ऐसा नहीं सोचा था।
. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था-_ “फूल 15 10 [001 पा छिलका (0 घ्राद6 पाहाए। 8 560010-812 ८0४ 00पा561४65सलनलमान वसा रमन पामफफभ पवन, पेशयनमक वन नम! पा पाायामी फेनेगफल' उलशकलर, मद, ला फााइकमाद) 'धददरपरय' काबाबमिक' हाल थ नया पाहकलल पकररलक लय न्याय
नै िकत सकयक दलककलर नकरद अन्यलल, व
न गए पल लि नगर पलक पतला पयनसकन कथन उुलगदलव,
व.'स्मिता और विकास, प्रो0 हीरालाल शुक्ल, म0प्र८ हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पृष्ठ संख्या 221.
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