ज्ञानामृत कलश | Gyanamrit Kalash
श्रेणी : काव्य / Poetry

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
174
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)(मालिनी)
न हो मद परभाव-त्याग रुष्टात दृष्टि
अति वेग से न वृत्ति, जबलौ उदय हो ।
तबलों भऋट प्रकाशी, ये स्वानुशुति स्वय,
हो सभी अन्य भावों से, बिल्कुल पृथक हो ॥ र६ ॥।
(स्वागता)
सर्वाँग,. चिदुरस परिपूर्ण मैं,
चिन्मात्र, एक स्व को स्वाद स्वयं ।
किचित् भी, मोह मेरा नहीं नही,
चिदुघन, मैं तो शुद्ध तेज पुज ॥ ३०॥।
(मालिनी)
सकल अन्य भावों से, यो करके विवेक,
यह उपयोग स्वयम्, एक आत्मा को धार ।
प्रगटित परमाथ, दर्शन, ज्ञान-वृत्ति,
परिणति से रमता, आत्म उद्यान मे ही ॥ ३१ ॥
(वसततिलका)
भगवान ज्ञान सिन्धु, सर्वाग उछला,
विध्वम पटलब हटा, जड्मूल से ये ।
अत्यन्त मग्न हो जग, सब एक साथ,
त्रिलोक व्यापक ज्ञान के शात रस में ॥ ३२ ॥
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