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Varma shobha by शुभा वर्मा

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ंढ । दाढ़ी-मूंछ साफ'' उंगलियों से होंठों तक की यात्रा करती, जल-जलकर वाक होनेवाली पहलवान छाप वीड़ी । दस्सियत मामूली से थोड़ा हटकर लगी । “आपका कॉलम बड़े मन से पढ़ा जाता है।” अपनी ओर देखती छाहाना की आंखों में झांककर सेन ने कहा । “लगता है, आपने कोई सर्वेक्षण कराया है।” एक खुली नज़र शाहाना पर डालकर सेन कॉफ़ी पीने लगा, वोला कुछ नहीं । थोड़ी देर दोनों खामोश रहे । शाहाना ने अपनी कॉफ़ी का अन्तिम घूंट भरते हुए पहल की । आप ज्यादातर बाहर ही रहते हैं शायद ।” “पापी पेट के लिए रहना पड़ता है।” “पिछले दो वर्षों में वुल तीन-चार वार देखा होगा आपको यहां । डी “इतना बाहर तो नहीं रहता । वैसे आप आतीं भी तो हफ्ते में एक वार हैं । जब आप आती हैं, मैं जा चुका रहता हूं ।' “औसतन कितना समय आपको वाहर विताना पड़ता है ? ” कोई तय नहीं । कभी-कभी तो दो-तीन महीने लगातार बाहर रहता हूं ।” “इसीलिए शायद पाठकों का मत पढ़ने का मौका आपको ज्याद मिलता है ? ” जी हां, तभी कहां, आपका कॉलम वहुत्त पढ़ा जाता हूँ । आपने क्या सोचा, में मजाक कर रहा हूं ? ” 'गोसी गुस्ताखी मैं पहली मुलाक़ात में नहीं करती ।” आप तो बुरा मानने लगीं ! ” नहीं तो *' 'मैंने बस यूंही कह दिया ।” “यूंही कहकर लोगों पर वड़े-वड़े हमले कर दिए जाते हूँ ।”' “ने आपपर हमला तो नहीं किया ।” शाहाना ने मुसकुराहट का शोख परदा अपने चेहरे से हटा लिया । “और हमला किस तरह किया जाता हूं? ” 'पमकार की चमड़ी तो मोटी होती हैं । आप तो खासे भावुक हैं “पी पत्रकार होने से पहले एक ईमानदार आदमी हूं ।” फ्री-लांसर / १७




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