ग्राम - सुधार की एक योजना | Gram Sudhar Ki Ek Yojana

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Gram Sudhar Ki Ek Yojana by जे. सी. कुमारप्पा - J. C. Kumarappa

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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योजना की आवईयकता और स्वरूप १९ द्रस्यान मैं सोचता रहा कि यह अकाल केसे टाला जाय । खाद्य दसारी चिंता का प्रथम विषय होना चाहिए। उस वक्त मुझे यह सुझाई दिया कि खाद की दृष्टि से देश में हसें हर जगह स्वयंपूण हिस्से निर्माण कर देने चाहिए । ऐसा करते समय दमें अन्न की कीमत खाद्य की दृष्टि से ऑकनी चाहिए, न कि पेसे की दृष्टि से । इसछिए संतुदित आहार की चृष्टि से हमें शुरुआत करनी चाहिए। हिन्दुस्तान में लोग सामान्यतः अनाज से ही अपना पेट भरते है--अनाज से पूर्ण रूप में शरीर को आवश्यक खाद्य-तच्ष्च नहीं मिछते । यदि दम खेती का आयोजन इस तरह करें कि हरएक गॉव अपने लिए संतुठित आहार पेदा करे, तो हमको आसानी से संतुठित आहार मिल सकता है । उस पर से प्रत्येक ब्यक्ति के ठिए झावश्यक जमीन का हिसाब छगा सकते हैं. । अखिल भारतीय पैदावार के औसत ऑकड़े प्राप्य है । वस्तुतः स्थान- स्थान पर इनमें फकें पड़ेगा । यदि हम फी आदसी रोजाना १६ औस अनाज रखें, तो हमारी कुछ जमीन के ६५२ प्रतिशत भाग में अन्न पेदा करना पड़ेगा । इसी तरदद फी आदसी रोजाना ५ तोला दाल के हिसाब से श्राठ प्रतिशत जमीन दाछ वोने के लिए लगेगी । इस पुस्तक में एक ठाख की आबादी के लिए जमीन के बंटवारे का कोष्ठक दिया गया है.। उसमें अनाज, दाल, गुड़, तिलहदन, तरकारी, फू आदि के छिए कितनी जमीन लगेगी, इसका हिसाव बताया गया है । यदि एक देहात या नजदीक के देह्मातों का एक समूह इस अलुपात में चीजें पेदा करे, तो छोगों की प्राथसिक आवश्यकता कही पूर्ति होती और इसलिए हसको ये चीजें पढ़ा करने पर उतारू होना चाहिए । यदि कोई कहता है कि सेरे पास इतनी एकड़ जमीन है और में उसमें तंवादू पैदा करूँगा, तो उसे ऐसा करने का कोई अधि- कार नहीं है। फिर चाहे उसको उसमें अधिक पैसे क्यों न मिलते हो ? जमीन एक सामाजिक पूँजी दे ओर सामाजिक आदश्यकताओं




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